दुर्योधन मंदिर कहां है और महाभारत से क्या है इसका संबंध ? जानिए

NEW DELHI : UTTARAKHAND देवो की भूमि के रुप में पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां गली-गली में मंदिरों की भरमार पायी जाती है । हिन्दू धर्म में जितने देवताओं की कुल संख्या है उससे कही अधिक अकेले उत्तराखण्ड राज्य में देवताओं की संख्या है । क्योंकि यहां हिन्दू देवी-देवताओं के आलावा स्थानीय ग्रामीण देवताओं और कुल देवताओं की भरमार देखी जा सकती है । इस धरती पर अजीबो-गरीब नाम के अलग-अलग देवताओं की पूजा की जाती है। भले ही महाभारत के पात्र DURYODHAN को लोग हेय दृष्टि से देखते हों और महाभारत में की गई उनके व्यवहार को गलत ठहराते हों लेकिन देवों की भूमि में दुर्योधन को भी पूजा जाता है । MAHABHARAT के खलनायक कहीए या नायक कहीए दोनों में दुर्योधन फिट दिखाई पड़ते हैं ।

UTTARAKHAND राज्य के उत्तरकाशी जिले के नेतावर नामक जगह से करीब 12 किमी की दूरी पर हर की दून नामक रोड के किनारे बसा है सौर गांव, यही दुर्योधन का मंदिर विराजमान है । इस मंदिर के बनने के पीछे एक बड़ी ही रोचक कहानी है । एक मान्यता के अनुसार पाताललोक का राजा भुब्रूवाहन द्वापर युग में कौरवों और पांडवों के बीच हो रहे महाभारत के युद्भ में कौरवों की तरफ से लड़ना चाहता था । मन में यही चाहत लिए वह धरती पर उतरा लेकिन भगवान कृष्ण उसे युद्ध में शामिल नहीं होने देना चाहते थे ।

कृष्ण भगवान को इस बात की अंदेशा थी कि अगर भुब्रूवाहन युद्ध में शामिल होता है तो ARJUN की पराजय हो सकती है । इस तरह सत्य पर असत्य की विजय हो जाती और संसार को गलत संदेश जाता । इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए भगवान कृष्ण ने भुब्रूवाहन के साथ एक शर्त लगाई । शर्त यह थी कि युद्ध में भुब्रूवाहन शामिल तभी हो सकता था जब वह एक ही तीर से पेड़ के सारे पत्तियों को छेद  देता ।

इस शर्त को भुब्रूवाहन मान गया और उसने तीर चलाई और एक पत्ता को छोड़कर  पेड़ के सारे पत्तियों को छेद दिया, जिस पत्ती को नहीं छेद पाया था उस पत्ती को भगवान कृष्ण ने पैर से दबाकर रख लिया था। जब तीर इस पत्ती को छेदने के लिए आई तो भगवान कृष्ण  पैर को हटा लिए और भुब्रूवाहन को निष्पक्ष रहने को कहे । इसका सीधा मतलब होता की वह किसी भी तरफ से युद्ध में शामिल नहीं होता

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भुब्रूवाहन को यह शर्त मंजूर नहीं थी । इस पर भगवान कृष्ण ने सत्य की रक्षा के लिए उसके धड से सिर अलग कर दिए । लेकिन उसने युद्ध को  देखने की इच्छा जाहिर की, जिसके बाद भगवान कृष्ण ने उसके सिर को एक पेड़ पर टांग दिया जहां से वह महाभारत को देख सकता था । उत्तराखण्ड के लोगो के बीच यह मान्यता है कि पेड़ पर टांगने के बाद युद्ध में कौरवों की सेना जब-जब पराजित होती तो भुब्रूवाहन पेड़ पर से चिल्ला-चिल्लाकर कौरवों को युद्ध रणनीति बदलने को कहता है और जोर-जोर से रोता । ऐसी मान्यता है कि आज भी वह रो रहा है । यहां के स्थानीय लोग आज भी इसको वीर मानते है । दुर्योधन पाताललोक के इस राजा का बड़ा प्रशंसक और मित्र था । इसके कारण दुर्योधन का मंदिर बनाया गया ताकि इन दोनों परम मित्रों को हमेशा याद रखा जा सके ।

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