इस तस्वीर की विजय कहानी, जिसने 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को दिया था जीवनदान

New Delhi: आज से 46 साल पहले सन् 1971 में भारत ने पाकिस्तान को करारी मात दी थी। साथ ही पाकिस्तान को दो हिस्सों में बांट दिया था। भारतीय सैनिकों के इस त्याग, बलिदान और शौर्य के दिन को विजय दिवस के रुप में मनाया जाता है।

1971 में भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान सेना को करारी हार का मुंह देखना पड़ा था और 16 दिसंबर 1971 को ढाका में 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय जवानों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था। इसे 20वीं सदी का सबसे बड़ा सैन्य समर्पण किया जाता है। भारतीय सेना की इस बड़ी जीत के दिन को विजय दिवस के रुप में मनाया जाता है।

93 हजार सैनिकों ने टेके घुटने-

12 दिनों तक चले इस भीषण युद्ध में अनेक भारतीय वीर सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी और हजारो लोग घायल हुए। करीब 3900 जवान इस जंग में शहीद हुए और 9851 जवान घायल हुए। भारतीय सैनिकों के इस महान पराक्रम के सामने पाक सेना का नेतृत्व कर रहे लेफ्टिनेंट जनरल एके नियाजी ने अपने 93 हजार सैनिकों के साथ भारतीय सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और अपनी हार स्वीकार की।

पाक सैनिकों ने मांगी जान की भीख-

इस ऐतिहासिक युद्ध में भाग लेने वाले एक रिटायर्ड बिग्रेडियर के मुताबिक करारी हार बाद पाकिस्तान के सैनिक भारत से अपनी जान की भीख मांग रहे थे। भारतीय सेना के जवान अपने शक्ति का लोहा मनवाते हुए मैदान ए जंग में आगे बढ़ते जा रहे थे। लेकिन कहते हैं कि दुश्मन को भी जीने का हक होता है इस बात का परिचय देते हुए भारतीय सेना ने 93 हजार पाक सैनिकों को सिर्फ आत्मसमर्पण करने को कहा।

Vijay Diwas

बांग्लादेश का एक देश के रुप में हुआ उदय-

उस समय भारतीय सेना की कमान संभाल रहे थे जनरल सैम मानेकशॉ। इस जंग में भारत ने पाकिस्ता को करारी शिकस्त दी थी, जिसके बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हो गया था जिसे आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है। दरअसल पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह ने याहिया खां ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकते से मिटाने का आदेश दे दिया। जिसके बाद बांग्लादेशी शरणार्थी भारत आने लगे।

इंदिरा ने दिखाया अपना दम-

जब भारत में पाकिस्तान सेना के दुर्व्यवहार की खबरे आई तब भारत पर दबाव बढ़ने लगा कि वहां पर सैन्य हस्तक्षेप करें। तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चाहती थी कि अप्रैल में भारतीय सेना आक्रमण करें। इस बारे में इंदिरा गांधी ने थलसेनाध्यक्ष जनरल मानेकशॉ की राय ली। मानेकशॉ ने सियासी दूबाव में झुके बिना प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बेबाक अंदाज में कहा कि वे पूरी तैयारी के साथ पाकिस्तान का मुकाबला करना चाहते हैं। मानेकशॉ की यह रणनीति रंग लाई जिसका परिणाम बांग्लादेश के रुप में दुनिया के सामने है।

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