बचपन में नमक-मिर्च से खाते थे रोटी, 21 परीक्षाओं में हुये फेल, पर हार नहीं मानी और बन गये अफसर

New Delhi : प्यासे रहो न दस्त में बारिश के मुन्तजिर, मारो जमीं पर पांव तो पानी निकल पड़े!!!
आज हम आपको जिस शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं उसकी जिंदगी और उसका जुनून ऊपर लिखी इकबाल साजिद की इस गजल जैसा ही रहा। जिसने अपनी प्यास बुझाने के लिए बारिशों का इंतजार नहीं किया वो अपने पांव जमीं पर तब तक मारता रहा जब तक कि खुद जमीं से पानी न निकल पड़ा। इस शख्स का नाम है गिरधर सिंह रांदा। गिरधर राजस्थान में भारत-पाकिस्तान बार्डर पर बसे बाड़मेर जिले के छोटे से गांव उंडखा के रहने वाले हैं। जितना अविकसित इनका गांव है इससे कई गुना पिछड़ा हुआ इनका परिवार था।

परिवार में इतनी गरीबी थी कि वो बताते हैं कि बचपन में परिवार में लाल मिर्च कूट कर उसे नमक के पानी में डालकर खाना पड़ता था और किसी किसी दिन तो वो भी नसीब नहीं होती थी। अपने परिवार की इस हालत सुधारने के लिए उन्होंने बचपन से ही सरकारी नौकरी पाने का सपना देखा था। लेकिन उन्होंने 10वीं पास करने के बाद से 12वीं पास करने तक कुल 21 सरकारी परीक्षाएं दी पर किसी में सफल नहीं हुए। समाज से लेकर परिवार वाले भी उन्हें ताने देते थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी मेहनत के दम पर सभी को जवाब दिया और सरकारी नौकरी पाकर अपने परिवार के हालात सुधारे।
जिस गांव से गिरधर ताल्लुक रखते हैं उस गांव में गिने चुने बच्चे ही स्कूल जाते थे उन बच्चों में गिरधर भी थे। गिरधर बताते हैं कि घर में इतनी गरीबी थी कि पढ़ाई लिखाई दूरी की बात लगती थी। वो सुबह स्कूल जाते और 50 डिग्री तापमान में नंगे पैर घर वापस आते। उनके पैरों में छाले पड़ जाते थे। इसके बाद वो घर नहीं सीधे अपने काम पर जाते थे जो या तो होटल होता था या तो सब्जी का ठेला, या फिर बोझा ढोने का गोदाम। अपनी सारी पढ़ाई उन्होंने इस तरह के काम करते हुए की। घर में पिता थे जो कि बहुत शराब पीते थे। एक बड़ा भाई था जो कि विक्लांग था। अब घरवाले गिरधर से पढ़ाई छोड़ने और बाहर जाकर काम करने पर दबाव डालने लगे। लेकिन उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी उन्होंने होटल में खाना बनाकर सब्जी का ठेला लगाकर और बोझा उठाकर अपने घर के लिए कमाया और अपनाी पढ़ाई को जारी रखा। दसवीं पास करने के बा उन्होंने सरकारी नौकरी के फॉर्म भरने शुरू किए। 12वीं पास करने के बाद उन्होंने बैंक पीओ से लेकर एसएससी ग्रुप सी तक की कुल 21 परीक्षाएं दी पर किसी में सफल नहीं रहे।
परीक्षा में हर बार फेल होने के बाद वो फिर किताब लेकर बैठ जाते थे। गांव वाले उनसे कहते कि परिवार इतनी गरीबी में जिंदगी गुजार रहा है और बेटे को अधिकारी बनने की सनक सवार है। एक समय में उनके परिवार वाले भी उन्हें उनकी नाकामियों के लिए गालियां देने लगे थे। उन्हें हर परीक्षा में फेल होने की आदत हो गई थी। कारण था कि गरीबी के कारण वो अपनी पढ़ाई में उस स्तर तक का ध्यान नहीं दे पाए थे जितना कि नौकरियों में पूछा जाता है।

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी उन्होंने हार को हराकर जीत पाई। जब अधीनस्थ सेवा बोर्ड ने ग्राम विकास अधिकारी की पोस्ट निकाली तो उन्होंने इसकी भी परीक्षा दी और परीक्षा देकर वो फिर से पढ़ाई में जुट गए। दो महीने बाद परीक्षा का परिणाम आया तो उनका सिलेक्शन हो गया। पूरे गांव ने उनकी कामयाबी का जश्न मनाया। सभी ने शाबाशी दी।

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