बड़े काम का है यह चावल, स्‍वाद बेमिसाल-शुगर भी न के बराबर

New  Delhi : UP के सिद्धार्थनगर जिले में पैदा होने वाला कालानमक चावल पैदावार कम और महक खत्म होने से अब पहचान के संकट से जूझ रहा है। विभागीय सूत्रों ने बताया कि जलवायु संकट और कम बारिश से काला नमक चावल की पैदावार प्रभावित होने से किसानों का कालानमक की खेती से मोह भंग हो गया है।

एक दशक पूर्व 20 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल से अधिक में खेती होती थी जो अब घटकर 5000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में ही रह गई है। फिलहाल बीते साल की तुलना में इस साल कालानमक धान की खेती डेढ़ गुना बढ़ी है। ऐसे में उम्मीद जगी है कि अपने बेहतर पोषण गुणों के कारण आने वाले दिनों में यह यहां के लोगों की सेहत के लिए भी वरदान साबित होगा।

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान अंग्रेज यहां के कालानमक चावल की खुशबू के इस कदर दीवाने हो गए थे कि उन्होंने इस इलाके में काला नमक चावल के खेतों की ङ्क्षसचाई के लिए 10 कृत्रिम सागरों और 243 किलोमीटर लंबी नहरों का निर्माण करा डाला। इसके बाद यहां पैदा होने वाला कालानमक चावल खाड़ी देशों से लेकर यूरोप तक भेजा जाने लगा। देश को आजादी मिलने के बाद कालांतर में यहां बनाए गए सागर और नहरें सिल्ट से पट जाने से कालानमक चावल की खुशबू और पैदावार धीरे-धीरे खत्म होने से अपनी पहचान खोता चला गया। अब तक काला नमक की खेती को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं।

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