तुलसीदास जयंति : श्रीराम के परम भक्त थे तुलसीदास, रामचरितमानस के इन दोहों में छिपा सफलता मंत्र

New Delhi : गौस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य की भक्ति पंपरा के महान कवि हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन राम को समर्पित कर दिया हालांकि शुरूआत में राम भक्ति की ओर उनका ऐसा रुझान न था। लेकिन उनके जीवन में घटी एक घटना से वो इस तरह राम भक्ति में डूबे कि सारा जीवन उन्होंने राम को समर्पित कर दिया। उनके इस भक्ति भाव का ही परिणाम है कि आज रामचरितमानस जैसे महाकाव्य से पूरा विश्व अभिभूत है। आज उनकी जन्म जयंति पर आइए जानते हैं उनके बारे में।
तुलसीदासजी का जन्म संवत 1589 को उत्तर प्रदेश (वर्तमान बाँदा ज़िला) के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। दरअसल उनकी पत्नी की ही वजह से उनका जीवन सार्थक बना। अपनी पत्नी रत्नावली से अत्याधिक प्रेम के कारण तुलसी को रत्नावली की फटकार “लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ” सुननी पड़ी जिससे इनका जीवन ही परिवर्तित हो गया।
तुलसी का बचपन बड़े कष्टों में बीता। माता-पिता दोनों चल बसे और इन्हें भीख मांगकर अपना पेट पालना पड़ा था। इसी बीच इनका परिचय राम-भक्त साधुओं से हुआ और इन्हें ज्ञानार्जन का अनुपम अवसर मिल गया। पत्नी के व्यंग्यबाणों से विरक्त होने की लोकप्रचलित कथा को कोई प्रमाण नहीं मिलता। तुलसी भ्रमण करते रहे और इस प्रकार समाज की तत्कालीन स्थिति से इनका सीधा संपर्क हुआ। इसी दीर्घकालीन अनुभव और अध्ययन का परिणाम तुलसी की अमूल्य कृतियां हैं, जो उस समय के भारतीय समाज के लिए तो उन्नायक सिद्ध हुई ही, आज भी जीवन को मर्यादित करने के लिए उतनी ही उपयोगी हैं। तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 39 बताई जाती है। इनमें रामचरित मानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली, गीतावली, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
रामचरितमानस लोक ग्रन्थ है और इसे उत्तर भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। इसके कुछ दोहे इस प्रकार हैं।

1) मनोकामना पूर्ति एवं सर्वबाधा निवारण हेतु- ‘कवन सो काज कठिन जग माही। जो नहीं होइ तात तुम पाहीं।।’
2) भय व संशय निवृ‍‍त्ति के लिए- ‘रामकथा सुन्दर कर तारी। संशय बिहग उड़व निहारी।।’
3) अनजान स्थान पर भय के लिए मंत्र पढ़कर रक्षारेखा खींचे- ‘मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृतवर चाप रुचिर कर सायक।।’
4) भगवान राम की शरण प्राप्ति हेतु- ‘सुनि प्रभु वचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।’
5) विपत्ति नाश के लिए- ‘राजीव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।।’

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