पंडित नेहरु: भारत के हर व्यक्ति की जीत ही भारत माता की जीत है

New Delhi: आज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की जन्मजयंती है। नेहरू को बच्चों से गहरा लगाव था, उनके निधन के बाद उनकी जन्मजयंती के मौके पर पूरा भारत बाल दिवस मनाता है। 20 नवंबर को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा बाल दिवस के रूप में घोषित किया गया। पहले भारत में भी 20 नवंबर को बाल दिवस मनाया जाता था। पर 27 मई, 1964 को जब जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ तब ये निर्णय लिया गया कि अब नेहरू के जन्मदिवस पर ये बाल दिवस मनाया जाएगा। और इस बात को पूरे देश ने स्वीकारा भी।

भारत माता कौन हैं? इस सवाल पर नेहरू कहते हैं- ‘ये नदियां, पहाड़, खेत घने जंगल ये सब तो भारत माता हैं ही। लेकिन सबसे जो जरुरी है वह है भारत में बसने वाले लोग , लोगों के बना यह सब कुछ व्यर्थ है। अपने करोड़ों बेटे-बेटियों से ही भारत माता की पहचान है और उन सबकी जीत ही भारत माता की जीत है। यानी की भारत का हरेक व्यक्ति अपने आप में भारत माता है’।

नेहरू को याद करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल लिखते हैं- नेहरू ने आधुनिक भारत की नींव रखी , वह एक दूरदर्शी नेता थे। सभी बाधाओं से लड़ते हुए उन्होंने देश को विकास के पथ पर मजबूती से आगे बढ़ाया। उनकी विरासत का लाभ हम ले रहे हैं।

नेहरू को याद करते हुए पत्रकार साक्षी जोशी लिखती हैं – ‘नेहरू सहिष्णुता, सहकर्मियों के प्रति सम्मान, एक आदर्श भारत का सपना देखने वाले, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, विकास, प्रगति के एक सच्चे उदाहरण, अतीत से अधिक भविष्य के बारे में सोचने वाले थे।

जिस गाँव में पंडित नेहरु पहुँच जाते थे वहां के लोग कहते थे कि ‘यह हमारे गाँव का पुण्य है जो नेहरु आए हैं’। लोग उन्हें देख भर लेने से गर्वित हो जाते थे।

आज जब किसी नेता पर टिपण्णी भर कर देने से जेल तक जाना पड़ता है तो नेहरु के बारे दिनकर का लिखा यह प्रसंग याद आता है। दिनकर लिखते हैं- ‘सन् 1946 ई. में जब बिहार में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए, पंडितजी पटना आए थे और प्रायः अपनी ही देखरेख में वे फौजियों से काम ले रहे थे। पटना में बड़ा क्षोभ फैला और शाम को पंडितजी जब नौजवानों के बीच भाषण देने को सिनेट हॉल पहुँचे, तब लड़कों ने उनका कुरता फाड़ डाला और उनकी टोपी उड़ा ली। उस दिन भीड़ को काबू में लाने का चमत्कार जयप्रकाशजी ने दिखाया। जब भीड़ काबू में आ गई, जयप्रकाशजी लोगों की तम्बीह करने लगे। जब जयप्रकाशजी जी लोगों से यह कह रहे थे की “आपने पंडित जी का अपमान करके अपने-आपको अपमानित किया है” तभी पंडितजी जयप्रकाश जी को पीछे खींचकर खुद आगे आ गए और कहने लगे, “नहीं साहब! में बड़ा ही बेहया आदमी हूं। मेरी हतक- इज्ज़ती ज़रा भी नहीं हुई है। उलटे मैं आपसे खुश हूँ कि आपने बड़े ही जोश के साथ मेरा स्वागत किया है।”