चांद पर पंहुचने वाले ISRO को कभी बैलगाड़ी से पंहुचाने पड़ते थे रॉकेट, चर्च में खोलना पड़ा था ऑफिस

New Delhi: आज इसरों ने चन्द्रयान -2 के जरीए इतिहास रच दिया है। चंद्रयान-2 (Chandrayaan 2) को लेकर ‘बाहुबली’ रॉकेट से सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का सफर बैलगाड़ी से शुरू हुआ और आज उस मुकाम तक पहुंच गया है कि भारत ने चन्द्रयान -2 अंतरिक्ष में भेजने में क़ामयाब हुआ है। 

इसरो की यात्रा भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रमों के जनक माने जाने वाले डॉ विक्रम ए साराभाई की सूझबूझ से शुरू हुई. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में उसका जन्म हुआ और वहां से शुरू होकर अंतरिक्ष कार्यक्रम बना, फिर इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन बना।

गैरतब है कि ISRO का इतिहास काफी परिश्रम भरा रहा, यहां तक की रॉकेट के कलपुर्जों और अंतरिक्ष उपकरणों को प्रक्षेपण स्थल पर बैलगाड़ी और साइकिल से ले जाया गया था।इससे भी ज्यादा रोमांचकारी बात यह है कि भारत ने पहले रॉकेट के लिए नारियल के पेड़ों को लांचिंग पैड बनाया था. हमारे वैज्ञानिकों के पास अपना दफ्तर नहीं था, वे कैथोलिक चर्च सेंट मैरी मुख्य कार्यालय में बैठकर सारी प्लानिंग करते थे. अब पूरे भारत में इसरो के 13 सेंटर हैं।

इस क़ामयाबी में भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। हमारे छोटे रॉकेट पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हिकल (पीएसएलवी) के जन्म से पहले एसएलवी 3 रॉकेट प्रोग्राम में कलाम साबह का बहुत बड़ा रोल था। सबसे पहले एक छोटा सा उपग्रह आर्यभट्ट छोड़ा गया उसके बाद रॉकेट बने। पहला रॉकेट फेल हुआ तो सैटेलाइट लॉन्च व्हिकल (एसएलवी) 3 रॉकेट बना जो क़ामयाब रहा।

Chandrayaan-2 भारत के लिए दूसरा सबसे महत्वाकांक्षी चंद्र मिशन है। इसे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से भारी-भरकम रॉकेट जियोसिन्क्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल-मार्क 3 (GSLV Mk-III) से लॉन्च किया जा रहा है। Chandrayaan-2 का बजट 978 करोड़ रुपये है और इसका मकसद भारत को चंद्रमा की सतह पर उतरने और उस पर चलने वाले देशों में शामिल करना है। आज से ठीक 31 साल पहले इसी तारीख को हुई लॉन्चिंग पूरी तरह से सफल नहीं हो पाई थी। इसरो चीफ डॉ. के सिवन ने कुछ महीने पहले बोला था कि अब इसरो हर साल 10 से 12 लॉन्चिंग करेगा। यानी हर महीने एक लॉन्चिंग होगी। लॉन्चिंग की सफलता और असफलता के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इसमें मौसम, तकनीकी वजहें आदि शामिल हैं।