विपक्ष क्या होता है? एसी में बैठ ट्वीट-ट्वीट खेलने वाले नेताओं को शिवराज से क्लास लेनी चाहिए

New Delhi: भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और मध्य-प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने केंद्रीय राजनीति से किनारा कर लिया है। वह राज्य की राजनीति में ऐसे सक्रिय हैं जैसे मानों कुछ ही महींने में चुनाव हो। मध्य-प्रदेश विधानसभा चुनाव को बीते साल भर भी नहीं हुए , लेकिन शिवराज के विपक्ष के रूप में सक्रियता उन सभी के लिए एक सीख की तरह है जो सिर्फ ट्वीट-ट्वीट खेल रहे हैं। शिवराज सिंह चौहान एसी में बैठ कुछ अखबारी और टीवी ख़बरों के आधार पर सरकार को नहीं घेरते हैं , बल्कि वह जमीन पर उतरते हैं।

बसपा सुप्रीमो मायावती हों या सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश , बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव इन सबको विपक्ष की भूमिका क्या होती है शिवराज सिंह से क्लास लेने की जरुरत है। जब बिहार में चमकी बुखार से बच्चे मर रहे थे तब उन बच्चों के करांहते आवाज को सरकार तक पहुंचाने के लिए विपक्ष गायब था। वो तो भला हो राष्ट्रीय मीडिया का जो देर से ही जागा लेकिन जागा।

उत्तर-प्रदेश के सोनभद्र के उम्भा में जमीनी विवाद को लेकर 10 आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन खुद को दलितों के मसीहा के रूप में पेश करने वाली मायावती ने सिर्फ कुछ ट्वीट के जरिये अपना फर्ज निभा दिया। अखिलेश भी कई मौकों पर सिर्फ कुछ अखबारी खबरों के सहारे ट्वीट करके सरकार को घेर लेते हैं।

मध्य-प्रदेश भयंकर बाढ़ का कहर झेल रहा है।  सबसे ज्यादा मंदसौर बाढ़ से प्रभावित है। बाढ़ की वजह से लाखों किसानों का सोयाबीन समेत कई फसल बर्बाद हो गए है लेकिन शिवराज ने इस आपदा को लेकर केवल ट्वीट के जरिये सरकार को नहीं घेरा है बल्कि वह जमीनी हकीकत को सरकार के कानों में डाल रहे हैं। वह किसानों से मिलकर उन्हें सांत्वना दे रहे हैं।

मंदसौर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए शिवराज सिंह यह कहते हैं कि – ‘मंदसौर के मेरे भाइयों-बहनों, यह संकट की घड़ी है। मैं भले ही मुख्यमंत्री नहीं हूँ, लेकिन आपका भाई तो हूँ। आपकी मदद के लिए आया हूँ। सरकार से मेरी माँग है कि जिनके मकान गिर गये हैं, फसलें बर्बाद हो गई हैं, उन्हें शीघ्र राहत व मुआवजा दे’। यह बात सरकार के मंत्रियों को कहना चाहिये। किसानों के बढ़ते बिजली दरों को लेकर शिवराज ने सरकार को घेरा , उन्होंने कहा कि तुरंत बिजली बिल माफ़ हो। अगर सरकार उनकी मांगे नहीं मानती है तो वह धरने पर बैठ जाएंगे।