संघर्ष भरा सफर- पिता के साथ खुद भी की मजदूरी, पैसे के लिये इंटें ढोईं, अब बना कॉलेज में प्रोफेसर

New Delhi : कॉलेज का प्रोफेसर बनना या वहां पढ़ाना कोई आम बात नहीं है इसके लिए लंबी पढ़ाई के साथ साथ नेट/जेआरएफ जैसी कठिन परीक्षाओं को भी पास करना होता है। ग्रेजुएशन करने के बाद लगभग पांच साल का समय प्रोफेसर बनने की तैयारी और पढ़ाई को पूरा करने में लग जाता है। इस लंबी और कठिन पढ़ाई के आगे अच्छे-अच्छे घुटने टेक देते हैं। लेकिन जब इरादा पक्का हो तो दूर लगने वाली मंजिल पास मालूम होने लगती है और कठिन रास्ते भी आसान हो जाते हैं। ऐसा ही इरादा था बिहार के अमृत राज का जिसके रास्ते में ढ़ेरों मुसीबतें आईं लेकिन उसने कभी भी अपने सपनों से समझौता नहीं किया।

उन्हें परीक्षा की तैयारी के दौरान की खतरनाक बीमारियां हुईं लेकिन उन्होंने कभी पढ़ाई नहीं छोड़ी और अपने लक्ष्य के प्रति पूरे समर्पण के साथ लगे रहे। उन्हें लगातार तीन बार असफलता का सामना करना पड़ा लेकिन अपने चौथे प्रयास में अमृत राज ने नेट और जेआरएफ निकाल दिया और अब पीएचडी करते हुए कॉलेज में पढ़ा रहे हैं।
बिहार के जहानाबाद जिले के रहने वाले अमृत राज ने अपने क्षेत्र के विद्यार्थियों की तरह आईएएस बनना या फिर सरकारी सेवाओं में जाने की बजाए प्रोफेसर बनने की ठानी। घर में माता और पिता दोनों ही खेतों और मकान निर्माण में मजदूरी करते हैं। वो बताते हैं कि जब वो घर जाते थे तो वो खुद भी अपने पिता के साथ खेतों में मकान निर्माण के काम में मजदूरी करने जाते थे। पिता और माता लगभग अनपढ़ ही हैं। जितनी पढ़ाई अमृत ने की इतनी पढ़ाई उनके पूरे परिवार में आज तक किसी ने नहीं कर पाई। उनके गांव में पढ़ाई लिखाई का माहौल नहीं था। उन्होंने अपनी प्राइमरी लेवल की पढाई गांव के सरकारी स्कूल से की। पढ़ाई में उनकी रुचि देख उनके मामा जो कि पढ़े लिखे हैं और कंपाउन्डर का काम करते हैं वो उन्हें पढ़ाने के लिए अपने शहर गूंसा में ले गए। यहां से दससवीं तक की पढ़ाई पूरी की।
फिर जहानाबाद के स्कूल से उन्होंने 11वीं और 12वीं पास की। इसके बाद पटना कॉलेज से उन्होंने इतिहास विषय में स्नातक किया और फिर पोस्ट ग्रेजुएशन उन्होंने इग्नू से पूरा किया। ग्रेजुएशन के दौरान ही उन्हें नेट जेआरएफ की परीक्षा के विषय में जानकारी थी और तभी से उन्होंने परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने ठान लिया कि बनना है तो प्रोफेसर ही इससे नीचे कुछ नहीं। लेकिन उनके इस सपने के बीच कई अ़ड़चने आईं। वो लगभग तीन सालों तक बीमार ही रहे। डॉक्टर ने उन्हें ब्लड कैंसर होने का शक जता दिया था लेकिन जब ईलाज कराया तो उन्हें टीबी की बीमारी थी जिसके सफल ईलाज के बाद उन्होंने 2019 में नेट जेआरएफ की परीक्षा दी। ये उनका चौथा प्रयास था।

इस बार उनकी मेहनत रंग लाई और वो सफल रहे। अब उनके प्रोफेसर बनने और पीएचडी को आसानी से पूरा करने की राह और भी आसान हो गई है। वो प्रोफेसर बनने के योग्य हो गए हैं। और अब किसी कॉलेज में पढ़ा सकते हैं।

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