SPECIAL STORY: इस वजह से माता-पिता से ही बच्चों को मिलती है थैलेसीमिया, ऐसे बचें इस बीमारी से

New Delhi: आप कैंसर, डायबिटीज जैसी बीमारी को लेकर जागरुक हैं, लेकिन कुछ ऐसी बीमारी है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।  8 मई को world Thalassemia Day मनाया जाता है। आप जानते हैं ये बीमारी किसे और कैसे होती है। 

world thalassemia day इसलिए मनाया जाता है ताकि लोगों को इसके लिए जागरुक कर सकें। ये एक ऐसी बीमारी होती है जो ज्यादातर बच्चों में पाई जाती है। लेकिन सबसे पहले आपको ये जानना होगा कि बच्चों को बीमारी कहीं बाहर नहीं मिलती बल्कि माता-पिता से ही मिलती है। जी हां- ये एक जेनेटिक डिसऑर्डर है। ये एक खून की बीमारी होती है। तो चलिए आपको बताते हैं आप कैसे इस बीमारी से बच सकते हैं।

कैसे करें इस बीमारी की पहचान- ये एक ऐसी बीमारी है जो आमतौर पर बच्चों में तीन महीने के बाद होती है। इस बीमारी में शरीर में हीमोग्लोबीन बनने की प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है। इस वजह से खून में कमी आ जाती है। जब शरीर में हीमोग्लोबिन कम होता है तो कमजोरी हो जाती है जिससे दूसरी बीमारी होने का खतरा भी बढ़ जाता है। ये इतनी खतरनाक बीमारी होती है कि समय पर इलाज न मिले तो मौत तक हो सकती है। यह बीमारी 4 से 6 महीने में ही दिखना शुरू हो जाता है।

इस बीमारी में नाखून और त्वचा में पीलापन आने लगता है। इतना ही नहीं जीभ और आंखें भी पीली पड़ जाती है। बच्चों में ये बीमारी होते ही दांत निकलने में परेशानी आती है। इस बीमारी की वजह से बच्चों को भूख नहीं लगती है, वह चिड़चिड़े हो जाते हैं।

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ऐसे होती है ये बीमारी- यह बीमारी तब होती है जब महिलाओं और पुरुष के शरीर में मौजूद क्रोमोजोम खराब हो, लेकिन ऐसे में यह बीमारी माइनर होती है। जब पुरुष और महिलाओं में दोनों क्रोमोजोन खराब हो तो यह बड़ी समस्या बनती है। महिला और पुरुष में क्रोमोजोम खराब होने की वजह से इसका असर बच्चों पर भी पड़ता है। बच्चे के जन्म के 6 महीने के बाद से खून बनना बंद हो जाता है। ऐसे में बच्चों में बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। भारत में लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा बच्चे इस बीमारी से पीड़ित हैं। हर साल लगभग 10 से 12 हजार बच्चों को ये बीमारी हो जाती है।

क्या है थैलेसीमिया का इलाज-

इस बीमारी से बचने का सबसे पहला इलाज ये है कि मेडिकल चेकअप के बाद ही शादी करनी चाहिए। अगर लड़की और लड़की दोनों में माइनर थैलेसीमिया पाया जाता है तो बच्चे में मेजर थैलेसीमिया होने की संभावना बढ़ जाती है। इस बीमारी में ब्लड डोनेट

भ्रूण के विकास के शुरुआती चरण में विभिन्न आनुवांशिक बीमारियों का इलाज किया जाता है। जीन एडिटिंग तकनीक से थैलेसीमिया का भी इलाज किया जाता है।

कम वसा, हरी पत्तेदार सब्जियां ज्यादा से ज्यादा खाएं। हर रोज योग या फिर एक्सरसाइज करें। तो याद रखें थैलेसिमिया से बचाव के लिए जागरुक होना सबसे ज्यादा जरूरी है। बीमारी होने को रोक देना ही इसका इलाज है।