पंजाब CM अमरिंदर ने लाहौर में महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति के साथ तो’ड़फो’ड़ पर जताई ना’राजगी

New Delhi : पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने बुधवार को लाहौर में सिख शासक रंजीत सिंह की प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ की निंदा की और पाकिस्तानी सरकार से आरोपियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने का आग्रह किया।

कैप्टन अमरिंदर ने ट्ववीट करते हुये कहा “लाहौर में शाही किला में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा के साथ तोड़फोड़ की गई। हमारे सबसे सम्मानित सिख शासक की प्रतिमा का निरादर अत्यंत निंदनीय है। पाकिस्तान सरकार से आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने का आग्रह करता हूँ।”

आपको बता दें कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद से पाकिस्तान लगातार बचकानी ह’रकतें कर रहा है। कश्मीर पर भारत के फैसले से ना’राज़ दो पाकिस्तानी नागरिकों ने शनिवार के दिन श’र्मनाक हरकत करते हुये लाहौर में महाराज रणजीत सिंह की प्रतिमा को नु’कसान प’हुँचाया था।

जिसके बाद पुलिस ने अदनान मुगल और असद नामक दो व्यक्तियों को गि’रफ़्तार किया था । दोनों के ख़ि’लाफ़ ईश निंदा कानून के तहत मा’मला द’र्ज किया गया था । पुलिस द्वारा पहचान करने पर पता चला दोनों व्यक्ति क’ट्टरपंथी मौलाना खादिम रिजवी के धार्मिक संगठन तहरीक-लब्बैक पाकिस्तान से जुड़े हुए थे।

महाराजा रणजीत सिंह की नौ फीट की प्रतिमा का अनावरण उनकी 180 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर इसी साल जून में लाहौर किले में किया गया था। ठंडी कांसे से बनी प्रतिमा, घोड़े पर बैठे महाराजा को तलवार के साथ दिखाई देती है। इस श’र्मनाक घ’टना के बाद लाहौर अथॉरिटी की प्रवक्ता तानिया कुरैशी ने पीटीआई से कहा, ‘यह काफी दु’र्भाग्यपूर्ण घ’टना है।’ “हम लाहौर किले में सुरक्षा बढ़ाएंगे ताकि भविष्य में ऐसी कोई घ’टना न हो।” ईद के बाद जल्द से जल्द प्रतिमा की म’रम्मत करवा कर लोगों के लिये खोल दी जाएगी।

पंजाब पर शासन करते हुए महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर को अपना राजधानी बनाया था। जो अब पाकिस्तान के हिस्से में है। 19वीं शताब्दी में करीब 40 साल तक रणजीत सिंह पंजाब पर एकक्षत्र राज किया। वे सिख साम्राज्य के राजा थे। जिन्होंने न केवल पंजाब को मजबूत बनाकर एकजुट रखा, बल्कि अपने जीते-जी अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के पास भी नहीं भटकने दिया। रणजीत सिंह का जन्म सन 1780 में गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) संधावालिया जाट महाराजा महां सिंह के घर हुआ था। रणजीत सिंह जब महज 12 वर्ष के थे तब उनके पिता स्वर्गवासी हो गय। राजपाट का सारा बोझ इन्हीं के कंधों पर आ गया। गुरु नानक के एक वंशज ने उनकी ताजपोशी संपन्न कराई। उन्होंने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और सन 1802 में अमृतसर की ओर रूख किया था ।