पाक कार्यकर्ताओं ने मोदी से की पाक में मानवाधिकार उल्लंघन के मुद्दे को UNGA में उठाने की मांग

New Delhi: पाकिस्तान के राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आगामी संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के दौरान सिंध और अन्य प्रांतों में मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में बोलने का अनुरोध किया है। 

मानवाधिकार परिषद के 42 वें सत्र के दौरान “पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सम्मेलन” में बोलते हुए, सिंधी फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक मुनव्वर सूफी लघारी ने कहा, “सिंध में जो डर है उसे दूर करना सबसे कठिन चुनौती है। यह सिंध के अंदर से ही दूर नहीं किया जा सकता है, इसलिए एकमात्र जो उम्मीद है, वह बाहर है। और मेरा जोर संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका जैसे अन्य देशों के बारे में है। मैं यह सुझाव दे रहा हूं कि प्रधानमंत्री मोदी संयुक्त राष्ट्र में आ रहे हैं … उन्हें इसके बारे में बोलना चाहिए। क्योंकि भारत को भी सिंध से अपना एक नाम मिला है और सिंधियों के बहुत से लोग भारत में और बाहर भी रहते हैं।

लघारी ने कहा, “कम से कम वह (मोदी) मानवाधिकारों के बारे में बात कर सकते हैं, वह धार्मिक स्वतंत्रता के बारे में बात कर सकते हैं जैसा कि अमेरिका बात करता है। हाल ही में, वाशिंगटन डीसी में धार्मिक स्वतंत्रता पर एक सम्मेलन भी आयोजित किया गया था।”

बलूचिस्तान के मानवाधिकार परिषद के प्रमुख ताज बलूच ने कहा, “हालात और भी बदतर हो गए हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय बलूचिस्तान में हो रहे अत्याचारों पर चुप हो गया है। यहां लोग ‘जीवन के अधिकार’ से वंचित हैं। उन्हें उठा लिया जाता है, मार दिया जाता है और यह रुकने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है।”

ताज ने कहा, “अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों और संयुक्त राष्ट्र को बलूचिस्तान का दौरा करना चाहिए और स्थिति की जांच करनी चाहिए। उन्हें पाकिस्तानी सेना को ऐसे युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराध करने से रोकना चाहिए।”

पाकिस्तान को न केवल अपने ही देश में मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए दोषी ठहराया गया है, बल्कि पड़ोसी अफगानिस्तान में ‘जिहाद’ को बढ़ावा देने की भी निंदा की गई है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके), बलूचिस्तान और अफगानिस्तान के कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने भी इस कार्यक्रम में भाग लिया।आयोजन में भाग लेने वाले काबुल के एक पत्रकार बिलाल सरवरी ने कहा, ” अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका और छवि बेहद विनाशकारी रही है। अगर हम 2001 को देखें, जब तालिबान को सत्ता से हटा दिया गया था, तो यह अफगानिस्तान के लिए एक नई यात्रा थी – शांति के लिए और बेहतर कल के लिए एक लड़ाई । और दुर्भाग्य से, अफगानिस्तान में पाकिस्तान की छवि अक्सर सड़क के किनारे बम और आत्मघाती हमलों से जुड़ी है। यह सबसे छुपा तो है नहीं कि वहां जिहाद के नाम पर सार्वजनिक सभाऐं होती हैं, फंड इकट्ठा किया जाता है।

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