सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं : मेरी कोशिश है ये सूरत बदलनी चाहिए

New Delhi : दुष्यंत कुमार की गजलों से उनको समझने और जानने का प्रयास करें तो आप उनके काफी करीब पहुंच पाएंगे। उन्होंने कभी भी प्रसिद्धि या तारीफें बटोरने के लिए नहीं लिखा न ही उनके लेखन का उद्देश्य किसी बड़ी क्रांति को लाना था। लेकिन आजाद भारत की सूरत बदले इसके लिए उन्होंने भरपूर प्रयास किया। कई बार लोग ये धारणा पाल लेते हैं कि दुष्यंत कुमार ऐसे कवि थे जिसने सिर्फ सत्ता को लताड़ा और बगावत के गीत गाए। जब इस गजल में दुष्यंत कहते हैं कि “सिर्फ हंगाम खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है ये सूरत बदलनी चाहिए” तो इसका क्या मतलब है।

मतलब सिर्फ इतना है कि उनके लेखन का उद्देश्य सिर्फ सत्ता को गालियां देना नहीं है बल्कि देश के हर उस नागरिक में सजगता की वो आग भरना है जो खुद बिना किसी हीरो का इंतजार किए अन्याय,अत्याचार और झूठे आडंबरों के खिलाफ लड़ना सीखे। वो सब कुछ सहकर चुप न रहे उसके खिलाफ खुद आवाज बुलंद करना सीखे। वो इस आजाद लोकतांत्रिक देश के हर नागरिक को राजनीतिक चालाकियों को समझने और उनका पर्दा फाश करने की समझ देना चाहते हैं। दुश्यंत साफ कहते हैं-
मेरे सीने में न सही तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
ये आग सजगता की आग ही तो है जो देश में व्याप्त जातिवाद झूठे आडंबर भ्रष्टाचार अन्याय और अत्याचार के खिलाफ एकजुट हो ज्वालामुखी बन कर फूटेगी।लेकिन ये तभी संभव है जब ये आग किसी एक के सीने में नहीं सभी के सीने में बराबर जले, तभी दुश्यंत की जो सूरत बदलने की जो कोशिश है वो पूरी होगी।उनकी इसी कोशिश के बारे में प्रशिद्ध गजलकार निदा फाज़ली लिखते हैं- दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है।

दुष्यंत कुमार का नाम आज सिर्फ गजल के लिए ही जाना जाता है उनका नाम सुनते ही सिर्फ उनकी गजलें याद आती हैं लेकिन उन्होंने कविताएं कहानी और एक उपन्यास भी लिखा है। दिलचस्प बात ये है कि दुष्यंत की गज़लें लोगों को इतनी पसंद आईं कि उनके बाकी साहित्य से लोग अंजान होते चले गए। उनकी गजलें ही उनकी पहचान बन गईं। गजल ने कुछ कुछ शायरी के रूप में दुष्यंत के दिल में बहुत पहले ही जगह बना ली थी। उनके पिता चाहते थे कि बेटा कलेक्टर बने पर बेटे का मन तो शायरी और गजलों में ही लगता था।

वो कक्षा में अपनी शायरी और गजलों से अपने बाकी साथियों से खूब वाह वाही लूटते जब वो गजल कहते तो पूरे कॉलेज की बड़ी भीड़ उनको सुनने के लिए जुट जाती। उनका ये शौक बाद में पेशा बन गया। दुष्यंत जिस समाज और वातावरण में पले बढ़े उसे उन्होंने करीब से देखा था। उन्होंने सिर्फ शोषक वर्ग को ही नही उन लोगों की लाचारी और कायरता को भी देखा था जो सब कुछ सह कर बस जीवन को जीते रहना चाहते हैं, उसके खिलाफ आवाज उठाना नहीं जानते। वो इतने असहाय और लाचार हो गए हैं कि वो सारे आघात सह सकते हैं, परेशानियां सह सकते हैं पर उनका हल नहीं निकाल सकते, सारे अपमान का घूंट पीकर बस वो जीवन को जैसा है वैसा ही बने रहने देना चाहते हैं। दुष्यंत के लेखन का सारा उद्देश्य इस वर्ग में हिम्मत भरना है। इस वर्ग के बारे में एक गजल में लिखते हैं-
न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये
इसी वर्ग को प्रेरित करते हुए वो ये गज़लें भी लिखते हैं-
कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

दुष्यंत ने अपनी गजलों से एक ऐसी जमीन तैयार की जो आगे चलकर युवाओं के आंदोलन की आवाज का मंच बनी। 1974 में जब जेपी ने संपूर्ण क्रांति के लिए छात्रों का आह्वान किया तो हर छात्र मंच पर चढ़कर दुष्यंत कुमार की गजलें गाकर युवाओं में जोश भरता था। दुष्यंत ने भी आपात काल से पहले और इसके दौरान जो अनिश्चितता का माहौल बना उसके खिलाफ बेबाकी से लिखा।आज भी जब देश के विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र जब अपने हक के लिए सड़क पर उतरते हैं तो दुष्यंत कुमार की गजलें रह रह कर गूंज उठती हैं।
दुष्यंत के व्यक्तित्व को प्राय एक गुस्सेल एंग्री यंग मैन इके रूप में ही जाना जाता है लेकिन उनके पास एक विनम्र दिल भी था। उनके इसी दिल से प्रेम की खूबसुरत गजलें निकली जिसने युवाओं का दिल जीता। उनकी प्रेम पर लिखी एक गजल इतनी प्रशिद्ध हुई कि बॉलीवुड ने उसे गाने में पिरोया और फिर वो गाना भी खूब चला और हिट हुआ। मसान फिल्म का ये गाना था-
“तू किसी रेल सी गुजरती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूं
तू भले रत्ती भर न सुनती हो
मैं तेरा नाम बुदबुदाता हूं”
“एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ “
गजल के अलावा इनकी प्रेम पर ये कवितायें देखिये-
“मुझमें ज्वालामुखी है
तुममें शीत का हिमालय है
फूटा हूँ अनेक बार मैं,
पर तुम कभी नहीं पिघली हो”

इसके अलावा दुष्यंत की बहुत सी ऐसी गजलें हैं जो लोगों की जुबान पर रहती हैं। यही कारण है कि दुष्यंत कुमार आज भी देश के सबसे लोकप्रिय गजलकार के रूप में सबके दिलों में छाय हुए हैं। हर साल इनकी गजल की लाखों प्रतियां लोग खरीदते हैं और पढ़ते हैं।इनकी कुछ चर्चित और चुनिंदा गजल यहां पेश हैं–
1-सिर में सीने में कभी पेट से पाओं में कभी
इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है
1-आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख
घर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख
2-हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
3-ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा
4-भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दा
5-कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए
कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
6-अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए,
तेरी सहर में मेरा आफ़ताब हो जाए
7-अब किसी को भी नजर आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार
8-कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
9-इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है
10-मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
11-वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है
12-यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये
13-ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये
14-वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये
15-जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये
16-हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ

इनके अब तक प्रकाशित कविता संग्रह– जलते हुए वन का वसन्त /(कविता संग्रह) सूर्य का स्वागत / (कविता संग्रह) (1957) आवाज़ों के घेरे / (कविता संग्रह) साये में धूप / (ग़ज़ल संग्रह) एक कंठ विषपायी / (काव्य नाटिका)

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