विपक्ष महोदय आपको ईवीएम के भीतर नहीं खुद के भीतर झांकने की जरुरत है

आज सुबह 6 बजे ऑफिस के लिए निकल रहा था। रास्ते में केला बेच रहे एक ठेले वाले मिले । मोबाइल पर न्यूज़ चैनल लगाकर न्यूज़ देख रहे थे। मैंने पूछा ‘भैया कौन जीत रहा है आज ? उनका जवाब था मोदी जी’।

पिछले दिनों ऋषिकेश गया हुआ था। रास्ते में गाड़ी पंचर हो गई। पंचर बनाने वाला मुश्किल से 15 साल का एक लड़का था। मैंने ऐसे ही पूछ दिया और किसको वोट दिए? उसका जवाब था – मेरा नाम वोटर लिस्ट में नहीं है, घर वालों ने मोदी जी को वोट दिया है। मैंने पूछा मोदी जी ने क्या-क्या किया है? उसका जवाब था बहुत कुछ किया है। क्या किया है कुछ तो बताओ? बहुत कुछ। बहुत कुछ में उसके पास कुछ भी जवाब नहीं था। लेकिन मोदी जी का नाम लेते हुए वह बिल्कुल सहज था। ऐसी सहजता किसी राजनेता का नाम लेते हुए मैंने आज तक किसी में नहीं देखी। आम लोगों के मन में राजनीति , नेता के प्रति बस भ्रष्टाचार और चोरी जैसा शब्द जुड़ा हुआ है। ऐसे में एक नेता ने बच्चे- बच्चे की जुबान पर अपनी जगह बना ली है।

भैया हार्डवेयर और बिल्डिंग मटेरियल की दुकान चलाते हैं- आम चुनाव के दौरान जितनी बार भी उनसे बात हुई , चुनाव के बारे में जरुर चर्चा हुई। उनका कहना था कि – उन लोगों के जुबान पर भी मोदी का नाम है जिनके पास कल तक कोई राजनीतिक समझ नहीं थी, सब कहते हैं कि मोदी को वोट देंगे।

एग्जिट पोल और आज के रुझान से मुझे बिलकुल भी हैरानी नहीं हुई। रुझानो में एनडीए लगभग 350 के आंकड़े को छू रही है तो वहीँ यूपीए 90 सीटों के आस-पास सिमट रही है। पिछले कई दिनों से विपक्ष ईवीएम- ईवीएम चिल्ला रहा है। जबकि वो जमीनी हकीकत से बिल्कुल दूर  है। अगर विपक्ष जमीन पर होती तो आज उसे इवीएम को गलत ठहराने की नौबत नहीं आती।

ऐसा नहीं है कि मोदी ने पिछले पांच सालों में ऐसा कुछ कर दिया है या फिर भारत में स्वर्ग उतार दिया है कि उन्हें हराया न जा सके। बाजार का एक नियम है कि पहले लोगो के भीतर इच्छा जागृत करो। फिर सामान बेचो। और इस नियम में पूरी विपक्ष बिल्कुल नाकामयाब रही है। खेती-किसानी , बेरोजगारी , शिक्षा ये सब ऐसे मुद्दे है जिसपर एक अच्छा जनमत तैयार किया जा सकता है। इन  सारे मुद्दों की हालत पिछले पांच सालों में अच्छी नहीं रही। किसान आंदोलन हुए , छात्र आंदोलन हुए लेकिन वह केवल दिल्ली तक ही सिमट कर रह गए। मॉब लिंचिंग और दलितों के साथ अत्याचार के कई मामले आये। किसानों ने तो अपना खुद का पेशाब तक पिया लेकिन उस आंदोलन जिस व्यापकता के साथ पुरे विपक्ष देश भर के सामने रखना था पूरी तरह नाकामयाब हुई।

विपक्ष की सबसे बड़ा पार्टी कांग्रेस है। जिसको यह इन मुद्दों को बहुत मजबूती के साथ उठाना चाहिए थे। इन मुद्दों को सबसे पहले वामपंथियों और समाजवादियों ने उठाये और उसी को राहुल ने अपने चुनावी भाषणों में शामिल कर लिया। सॉफ्ट हिन्दुत्व को अपनाते हुए वह दलितों और मुसलमानों पर बात करने से बचते रहे।  जिस मजबूती के साथ आंदोलन होने चाहिए थे वह नहीं हुए। लोगो को उनके अपने ही समस्याओं के प्रति जागृत करने की जरुरत थी। राहुल गांधी का या उनके किसी भी नेता का कोई बड़ा आंदोलन नहीं दिखा। आप याद करें कि 2014 के पहले भाजपा के नेताओं ने किसी भी मुद्दें को नहीं छोड़ा। उन्होंने जमकर आंदोलन किया।

सिमटती हुई कांग्रेस को या फिर समूचे विपक्ष को ईवीएम पर बात करने के बजाए जमीन पर उतरने की जरुरत है। 2024 की तैयारी अभी से शुरू कर देनी चाहिए।