श्रीकृष्ण ने किया था नरकासुर का अंत, इसलिए दिवाली से पहले मनाई जाती है नरक चतुर्दशी

naraka chaturdashi
New Delhi: कार्तिक मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी (Naraka Chaturdashi) का पर्व मनाया जाता है, इसे छोटी दिवाली के नाम से भी जाना जाता है। इस बार यह तिथि 6 नवंबर दिन मंगलवार को है।

इस दिन को मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं लेकिन इनमें सबसे मशहूर कथा भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर नामक असुर की है। जिसने 16 हजार कन्याओं का बंदी बनाकर रखा था, जिससे भगवान श्रीकृष्ण ने बाद में विवाह किया था। आइए जानते हैं नरक चतुर्दशी के पीछे की कथा।

इनकी शरण में गए देवता

पुराणों के अनुसार, नरकासुर नामक असुर ने अपनी शक्ति से देवी-देवता और धरती पर भी सभी लोग उससे परेशान थे। असुर ने संतों के साथ 16 हजार स्त्रियों को भी बंदी बनाकर रखा था। जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता और ऋषि-मुनि भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए और उनको अपनी परेशानी के बारे में बताया।

Naraka Chaturdashi

नरकासुर को था श्राप

भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें नरकासुर से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया लेकिन नरकासुर को एक स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और उनकी सहायता से नरकासुर का वध किया। जिस दिन नरकासुर का अंत हुआ, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी।

दीपदान की परंपरा हुई शुरू

नरकासुर के वध के बाद श्रीकृष्ण ने कन्याओं को बंधन से मुक्त करवाया। मुक्ति के बाद कन्याओं ने भगवान कृष्ण से गुहार लगाई कि समाज अब उन्हें कभी स्वीकार नहीं करेगा, इसके लिए आप कोई उपाय निकालें। हमारे सम्मान वापस दिलवाएं। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए भगवान कृष्ण ने सत्यभामा के सहयोग से 16 हजार कन्याओं से विवाह कर लिया। 16 हजार कन्याओं को मुक्ति और नरकासुर के वध के उपलक्ष्य में घर-घर दीपदान की परंपरा शुरू हुई।

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