भारतीय क्रांति की वो माता जिन्होंने विदेश में पहली बार फहराया था भारत का झंडा

New Delhi: ‘यह आजादी का प्रतीक है। यह उन युवाओं के खून से बना है जिन्होंने भारत मां के लिए अपनी जां कुर्बान की है। बलिदानी का ये प्रतीक है। मैं आज इस झंडे के नाम पर हर उस इंसान से, उस पूरी दुनिया से अपील करती हूं कि हमारे इस संघर्ष को जो ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ है, सपोर्ट करे।’ ये शब्द हैं भीकाजी कामा के। जबरदस्त क्रांतिकारी थीं। ये शब्द उन्होंने तब बोले थे जब 21 अगस्त 1907 में सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस हुई थी जर्मनी के स्टुटगार्ड में। पूरी दुनिया के हजारों प्रतिनिधि आए थे और भारत का पहला झण्डा इन्होंने वहां पर फहराया था। वह दृश्य कमाल का रहा होगा। भीकाजी कामा को लोग काली का अवतार मानते थे। वह ऐसी पहली महिला थी जिन्होंने किसी इंटरनेशनल असेंबली में जाकर भारत का झंडा फहराया था। उनके नाम पर देश में कई मार्ग और बिल्डिंग हैं लेकिन आजादी की लड़ाई में उनका क्या योगदान रहा, ये बहुत कम लोग जानते हैं।

एक और वाकया है मिश्र देश का जिससे पता चलता है कि मैडम कामा महिला सशक्तीकरण के लिए भी प्रतिबध्द थीं। मिश्र  की राजधानी काहिरा में एक अधिवेशन हो रहा था जिसमें भीकाजी कामा बोलने के लिए पहुंची। वहां पर पुरुषों का ही जमावड़ा था। महिलायें दिखाई नहीं दे रही थीं। उन दिनों वे लंदन में रहा करती थीं। इंडिया हाउस से जुड़ी थीं। उस वक्त उन्होंने कहा था कि मैं यहां केवल पुरुषों को देख रही हूं, मातायें कहां हैं, बहनें कहां हैं। आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि जो हाथ पालना झुलाते हैं, वो व्यक्ति को बनाते भी हैं।

आराम छोड़ चुना क्रांति का मार्ग

मैडम भीकाजी कामा 24 सितंबर 1861 को मुंबई के एक पारसी परिवार में जन्मी थीं। बहुत ही अच्छी- खासी फैमिली थी। कामा के पेरेंट्स सोराबजी फ्रामजी पटेल और जीजीबाई सोराबजी पटेल का शहर में अच्छा- खासा नाम था। उनके पिताजी प्रसिध्द व्यापारी थे। बचपन से ही तेज- तर्रार कामा ने अंग्रेजी मीडियम से पढ़ाई की थी। अंग्रेजी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ थी।

1885 में इनकी जिंदगी में बहुत बड़ा मोड़ आया। 3 अगस्त को इनकी शादी श्री रुस्तम के. आर. कामा से हुई। रुस्तम एक वकील थे और ब्रिटिश सरकार के हिमायती थे। यहां पर दोनों की विचारधारा अलग- अलग थी क्योंकि भीकाजी ठहरी, मुखर राष्ट्रवादी। एक खुशहाल वैवाहिक जीवन न होने के कारण दोनों को अलग होना पड़ा।

विदेश में जाकर जगाई आजादी की अलख

1896 में मुंबई में पहले तो भयंकर सूखा पड़ा। उसके बाद प्लेग की बीमारी फैली। भीकाजी कामा से किसी का दुख नहीं देखा जाता था तो वह लोगों की मदद करने निकल पड़ीं। वहां मदद के लिए काम करते- करते भीकाजी कामा खुद बीमार पड़ गई थीं। इलाज के लिए वो 1902 में लंदन गईं और उसी दौरान क्रांतिकारी नेता श्यामजी कृष्ण वर्मा से मिलीं। इसके अलावा उनकी मुलाकात वी डी सावरकर, एमपीटी आचार्य और हरदयाल समेत कई क्रांतिकारियों से हुई। वे लंदन गईं तो थीं इलाज कराने लेकिन भारत वापिस ही नहीं लौटीं। क्रांतिकारियों के साथ मिलकर भारत की आजादी के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाने में लग गईं।

जब पहली बार फहराया तिरंगा

भीकाजी ने वर्ष 1905 में अपने सहयोगियों विनायक दामोदर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा की मदद से भारत के ध्वज का पहला डिजायन तैयार किया था। भीकाजी कामा ने 21 अगस्त 1907 को जर्मनी में हुई इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांफ्रेंस में भारतीय स्वतंत्रता के ध्वज को बुलंद किया था। इस झंड़े में हरा, केसरिया और लाल रंग की पट्टियां थीं।

तिरंगे को हाथ में लिए मैडम भीकाजी कामा

सबसे ऊपर हरे रंग की पट्टी थी जिसमें 8 कमल के फूल बने हुए थे। ये फूल भारत के 8 राज्यों के प्रतीक थे। बीच में केसरिया रंग था जिसमें देवनागरी में वंदे मातरम् लिखा हुआ था। सबसे नीचे थी लाल रंग की पट्टी। सबसे बडी चीज इसी में थी। इसमें एक तरफ आधा चांद था और दूसरी तरफ था सूरज। आधा चांद मुस्लिम धर्म को और सूरज हिंदू धर्म को दिखाता था। उनके तैयार किए गए इस झंडे से काफी मिलते−जुलते डिजायन को बाद में भारत के ध्वज के रूप में अपनाया गया।

झंडा फहराते हुए भीकाजी ने ज़बरदस्त भाषण दिया और कहा, “ऐ संसार के कॉमरेड्स, देखो ये भारत का झंडा है, यही भारत के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, इसे सलाम करो।”

1 जुलाई 1909 को 22 साल के इंजीनियरिंग स्टूडेंट मदनलाल धींगरा ने कर्जन वायली की हत्या कर दी थी। वायली उस समय भारत के सेक्रेटरी थे। उसी दौरान नासिक के तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर ए.एम.टी जैक्सन की भी गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। इस हत्या के बाद सावरकर पूरी तरह ब्रिटिश सरकार के चंगुल में फंस चुके थे। लन्दन में रहते हुये उनकी मुलाकात लाला हरदयाल से हुई जो उन दिनों इण्डिया हाउस की देखरेख करते थे।1 जुलाई 1909 को मदनलाल ढींगरा द्वारा विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दिये जाने के बाद उन्होंने लन्दन टाइम्स में एक लेख भी लिखा था। 13 मई 1910 को पैरिस से लन्दन पहुँचने पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया।

इसमें मैडम कामा का भी नाम आया लेकिन वह बाहर थीं। पहले वो जर्मनी गईं। फिर जर्मनी से अमेरिका और फिर फ्रांस चली गईं। फ्रांस जाने के बाद वो वहीं रहीं, वापिस नहीं आईँ। कोर्ट के आदेश के मुताबिक सावरकर को हिंदुस्तान वापिस भेजने का निर्णय हुआ। सावरकर को मोरिया जलयान से हिंदुस्तान ले जाया जा रहा था तो मार्सेलिस आते ही वो जहाज से कूद गए। मैडम कामा पेरिस में थीं। पेरिस से मार्सेलिस की दूरी ज्यादा नहीं थी तो वो तुरंत वी. वी. एस. अय्यर के साथ सावरकर को बचाने गईं। उन्हें पहुंचने में 10- 15 मिनट का विलंब हो गया था, तब तक वी डी सावरकर को गिरफ्तार किया जा चुका था। लेकिन वो चुप नहीं बैठीं। वह तुरंत मार्सेलिस के मेयर जां जोरे के पास पहुंची और बताया कि ब्रिटिश आरक्षकों द्वारा फ्रांस की भूमि पर सावरकर को बंदी बनाना फ्रांस का अपमान है। उन्होंने सावरकर को छुड़ाने की बहुत कोशिश की। इसके लिए वो ब्रिटिश दूतावास भी गईं और वहां के राजदूत को लिखित निवेदन दिया। उन्होंने लिखा, पिस्तौल मेरी थी। यह मेरा प्लान था। मैंने ही पिस्तौल चतुर्भुज अमीन के पास भेजी थी। इन बातों से साफ होता है कि मैडम कामा में साहस और देशभक्ति कूट- कूटकर भरी थी। 30 जनवरी 1911 को सावरकर को काले पानी की सजा सुनाई गई।

पहले विश्व युद्ध के दौरान वो दो बार हिरासत में ली गईं और उनके लिए भारत लौटना बेहद मुश्किल हो गया था। राष्ट्रवादी काम छोड़ने की शर्त पर आखिरकार 1935 में उन्हें भारत लौटने की इजाज़त मिली। मैडम कामा इस व़क्त तक बहुत बीमार हो चुकी थीं और बिगड़ते स्वास्थ्य के चलते 13 अगस्त 1936 में उनकी मौत हो गई।

उनका लोकप्रिय नारा था, “भारत आज़ाद होना चाहिए; भारत एक गणतंत्र होना चाहिए; भारत में एकता होनी चाहिए।”

1962 में भारत के पोस्ट एवं टेलीग्राफ़ विभाग ने गणतंत्र दिवस के दिन मैडम भीकाजी कामा की याद में एक डाक टिकट जारी किया।

फांसी की सजा सुनकर हंसने लगे थे खुदीराम बोस, जज से कहा- ‘आपको भी बम बनाना सिखा दूँगा’।

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