कमल खिलाने और जमीन सुरक्षित रखने की कोशिश के भंवर में बंगाल

New Delhi: कमल खिलाने की जद्दोजहद और जनाधार खिसकने का डर, बंगाल की राजनीति पर इनदिनों इनका ही साया है। मंगलवार की रात कोलकाता में अमित शाह की रैली के दौरान हुई घटना के यही दो केंद्रबिंदु हैं। दीगर है कि बंगाल में रविवार को सातवें यानि अंतिम चरण में 9 सीटों पर वोट डाले जाने हैं। और प्रदेश की सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस की राह में भाजपा सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।

ऐसा इसलिए भी है कि तृणमूल कांग्रेस ने विगत दो लोकसभा चुनावों में वामपंथी दलों की जमीन लगभग साफ़ कर डाली है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को केवल दो सीटों पर संतोष करना पड़ा। वहीं, उसी चुनाव में भाजपा ने दो सीटें पाकर बंगाल की राजनीति में अपनी दस्तक दर्ज कर दी। इन दो सीटों की दम पर पिछले पांच सालों में भाजपा ने बंगाल की राजनीति का पूरा समीकरण ही बदल डाला।

कभी तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के बाद सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले नेता मुकुल रॉय ने भी भाजपा का दामन थाम लिया। बंगाल में बीजेपी के उठान का अंदाजा शायद दीदी ने बहुत पहले ही लगा लिया था। तभी तो वो तीसरे मोर्चे के निर्माण की संभावनाओं के लिए की गई हर कोशिश में अगली पंक्ति में खड़ी नजर आईं। हालांकि, उनका यह प्रयास विभिन्न कारणों से सफल नहीं रहा। अगर इस दिशा में कुछ सकारात्मक निर्णय लिए गए होते तो तस्वीर कुछ और होती इससे इंकार नहीं किया जा सकता। तृणमूल कांग्रेस के खाते में अभी 34 सांसद हैं। यदि भाजपा बंगाल में कमल खिलाने की जद्दोजहद में सफल होती है तो देश की राजनीति में दीदी का कद कम हो सकता है।

मंगलवार को कोलकाता में हुए घटनाक्रम और उसपर जारी राजनीति की यही सबसे बड़ी वजह है। आज बुधवार को भी दोनों दलों के नेताओं के बीच आरोप- प्रत्यारोप का सिलसिला जारी रहा। दीदी की तृणमूल ने जहाँ प्रसिद्द समाजसुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा को तोड़े जाने को बंगाली अस्मिता से जोड़ा वहीं भाजपा ने अराजकता का सुर अलापा। समाजसुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा को तोड़े जाने के विरोध में ममता बनर्जी आज सड़क पर उतरीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बंगाल में एक रैली को सम्बोधित करते हुए प्रदेश में भाजपा की बढ़त पर मुहर लगा दी।

साफ़ है कि हिंदी भाषी राज्यों में पिछले चुनावी प्रदर्शन को न दोहरा पाने के भय ने भाजपा को बंगाल का रूख करने को मजबूर किया। और पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व किसी भी कीमत पर अपनी इस आस को धूमिल नहीं होने देना चाहता है। भाजपा की यही कूटनीति तृणमूल कांग्रेस के विजय रथ का रोड़ा है। अब देखना होगा कि राजनीति का यह विकृत रूप बंगाल में 23 मई को क्या गुल खिलाता है।