राम-जटायु मिलन : जटायु के बहते खून को देख राम ने आंसू क्यों नहीं बहाए?

New Delhi: रावण, माता सीता का हरण कर आकाश मार्ग से ले जा चुका है। भगवान श्रीराम और लक्ष्मण वन-वन भटक माता सीता को खोज रहे हैं। प्रभु चिल्लाते हैं – सीते ,सीते और लक्ष्मण चिल्लाते हैं भाभी,भाभी। तभी अचानक से राम-राम कहते  तड़पता हुआ एक पक्षी दिखाई देता है। जिसके पूरे शरीर से खून बह रहा है। उसके पर कट चुके हैं। नाम है जटायु।

जटायु को प्रभु श्रीराम अपनी गोद में लेते हैं। राम पूछते हैं हे-तात आपकी ऐसी दशा किस पापी ने की। जटायु कहते हैं- तुम आ गए राम , मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा में अपने प्राणों को रोके हुए था। मैं तुम्हें सीता का पता बताना चाहता था। सीता को बचाते-बचाते जटायु के पर कट चुके हैं , रावण उनपर कई प्रहार कर चुका है। जटायु कांपती आवाज में सीता के बारे में बताते हैं।

अपने भक्त की यह दशा देख प्रभु आंसू भी नहीं बहा पा रहे हैं। उनके ह्रदय में आंसुओं की गंगा बह रही है लेकिन प्रभु उसे बहने से रोक रहे हैं। प्रभु जानते हैं कि यदि मैं रोया तो आंसू की एक भी बूंद मेरे भक्त के घावों को और पीड़ा देगा। आंसू की प्रकृति खारा (नमक ) होती है। यदि बहते खून की जगह पर नमक पड़ जाए तो पीड़ा और बढ़ जाती है। मेरे राम अपने किसी भक्त को तनिक भी पीड़ा नहीं देते। प्रभु कहते हैं – हे तात मैं आपकी भी मौत का बदला रावण से लूँगा।

जटायु सीता की दास्ताँ सुनाने के बाद कहते हैं अब मेरा समय हो गया है। मैं अपने भाई दशरथ के पास जा रहा हूँ। यहीं पर प्रभु श्रीराम जटायु से एक विनती करते है। प्रभु कहते हैं – हे तात जब आप परलोक जाएँ तो सीता हरण के बारे में पिताश्री से न बताना। मैं चाहता हूँ रावण अपने पूरे खानदान समेत जब वहां पहुंचे तो पिताश्री के पैरों में गिरकर वह खुद पूरी दास्तान सुनाए ।