वृंदावन में भी स्थित है भगवान कृष्ण का रंगनाथ मंदिर, साल में सिर्फ एकबार ही होता है दर्शन

New Delhi: भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा में एक स्‍थान ऐसा भी है जहां कृष्‍णजी की भक्ति के साथ-साथ मंदिर की भव्‍यता भी है। लेकिन यहां की परंपराएं बहुत अलग हैं। दरअसल, हम बात कर रहे हैं वृंदावन स्थित रंगनाथ मंदिर (Rangnath Temple Vrindavan) की।

दक्षिण भारतीय शैली में बना रंगनाथजी का विशाल मंदिर (Rangnath Temple Vrindavan) अपनी अनूठी  वास्तुकला के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। मंदिर में गोपुरम दक्षिण भारत का एहसास कराता है तो पश्चमी एवम पूर्वी द्वार उत्तर भारत का। भगवान का मुख पूर्व की तरफ रहता है। बारहद्वारी यानी मंडप के एक तरफ वास्तु के अनुसार कुंड (पुष्करणी) यानी जल का निवास है तो दूसरी तरफ बगीचा है जहां से भगवान के लिए पुष्प जाते हैं।

पांच परिक्रमा और सात द्वार वाले इस मंदिर के हर परकोटे के चारों कोनों पर गरुडज़ी विराजमान हैं। जो शुभ संकेत प्रदान करने का अहसास कराते हैं। मंदिर के अंदर बने पुजारी एवम रसोइयों के आवास में कुएं, आंगन में बने हैं। इसके अलावा पूर्वी एवं पश्चमी कटरा की बनावट यज्ञ कुंड की तरह है। इस तरह के बने मंदिर को पुराणों में दिव्यदेश कहा जाता है।

उत्तर भारत का पहला दिव्यदेश मंदिर

भगवान नारायण के लोक को दिव्यदेश की संज्ञा दी जाती है। दिव्यदेश की पहचान इसकी पांच प्रमुख पहचान से होती है। दिव्य देश की पूर्णता को मंदिर परिसर में गरुण स्तंभ, गोपुरम, पुष्करणी, पुष्प उद्यान और गोशाला आवश्यक होती हैं। जो कि रंगजी मंदिर में विद्यमान हों और श्रीरामानुज संप्रदाय के द्वादश आलवारों द्वारा भगवान का मंगलाशासन किया गया हो, उनको भी दिव्य देश कहते हैं।

दक्षिण भारत में 108 दिव्यदेशों की चर्चा होती है। जिनमें से 106 दिव्यदेश इस भूतल पर प्रत्यक्ष दर्शन को प्राप्त होते हैं। उन दिव्यदेशों में श्रीरामानुजा संप्रदाय के द्वादश आलवारों द्वारा भगवान का मंगलाशासन किया गया है। आलवारों के द्वारा मंगलाशासन किए गए स्थानों को दिव्य देश की श्रेणी में रखा जाता है। दूसरे दिव्यदेश के पांच चिन्ह महत्वपूर्ण हैं।

इनमें प्रथम गरुण स्तंभ, जो भगवान के गर्भग्रह के समक्ष होता है। दूसरा गोपुरम जो मंदिर के मुख्य द्वार पर होता है। तीसरा भगवान की पुष्करणी जो मंदिर के प्रांगण में ही होनी चाहिए। चतुर्थ भगवान का पुष्प उद्यान, पांचवां भगवान की गोशाला ये पांचों चिन्ह जिस मंदिर में होते हैं वह दिव्य देश कहलाता है। उत्तर भारत में श्रीरंगमंदिर दिव्यदेश प्रमुख है। इससे पूर्व कोई भी दिव्यदेश उत्तरभारत में स्थापित नहीं हुआ। इसलिए उत्तर भारत का प्रथम और प्रमुख दिव्यदेश है। जहां आज भी भगवान की उपासना, पूजा दक्षिण शैली से ही विधिवत हो रही है।

प्रतिवर्ष मनाया जाता है यहां ब्रह्मेत्सव

श्रीरामानुज स्वामीजी के अपरावतार श्रीरंगदेशिक स्वामीजी महाराज ने श्रीगोदादेवी के अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए श्रीधाम वृंदावन में यमुना तट पर श्रीरंगमंदिर दिव्य देश की स्थापना की। जहां ये सभी चिन्ह विद्यमान हैं। इसलिए इस मंदिर में भगवान का श्रीब्रह्मेत्सव (बैकुंठ एकादशी) 12 दिन के लिए मनाया जाता है। जिनमें दो दिन प्रारंभ के अंकुरारोपण, अदिवास, यज्ञशाला की पूजा के होते हैं। दूसरे दिन विश्वक्सेन भगवान की सवारी भगवान के उत्सव का निरीक्षण के लिए भ्रमण करती है। जिसे ब्रज में लोग सड़क साफ के नाम से पुराकते हैं।

ये भगवान के प्रमुख सेनापति हें। तीसरे दिन या कहें ब्रह्मेत्सव के पहले दिन दिन प्रात:काल गरुण भगवान का आह्वान करके ध्वजारोहण होता है। भगवान की मौजूदगी में ध्वजरोहण के बाद ही भगवान की सवारी मंदिर से बाहर भक्तों को दर्शन देने के लिए निकलती है।

आचार्य रंगदेशिक स्वामी ने कराया रंगजी मंदिर का निर्माण

भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का दर्शन करवाते मंदिरों की नगरी वृंदावन में दक्षिण भारतीय संस्कृति का रंगजी मंदिर भी प्रमुख पहचान बनाए है। चारों ओर से गौड़ीय वैष्णव संप्रदायों के बीच रामानुज संप्रदाय का पताका फहरा रहे इस मंदिर निर्माण का श्रेय भले ही श्रीरंगदेशिक स्वामीजी को जाता हो। मगर, मंदिर निर्माण में मथुरा के धनाढ्य सेठ लक्ष्मीचंद और उनके भाईयों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। तन, मन और धन आचार्य रंगदेशिक स्वामीजी को समपिर्त कर तीनों भाईयों ने उनकी वृंदावन में श्रीगोदा देवी जी को रंगमन्नार के साथ ब्रज में प्रतिष्ठित करवाने की इच्छा पूरी की।

रंगजी मंदिर अभिलेखों में दर्ज है कि चेन्नई के अगरम् गांव निवासी श्रीरंगदेशिक स्वामीजी का जन्म विक्रम संवत 1866 को कार्तिक कृष्ण सप्तमी को हुआ था। युवा अवस्था में ही वे उत्तर भारत की यात्रा करते हुए गोवर्धन पहुंचे। वहां वैष्णव संप्रदाय के गोवर्धन पीठाध्यक्ष स्वामी श्रीनिवासाचार्य के अनुगत हो वैदिक सनातन धर्म के प्रचार में जुटे।इसी दौरान उनकी मुलाकात मथुरा के सेठ लक्ष्मीचद, राधाकृष्ण और गोविंद दास से हुई।

लक्ष्मीचंद को छोड़कर दोनों भाई राधाकृष्ण और गोविंद दास वैष्णवाचार्य श्रीशठकोप स्वामी की प्रेरणा से वैष्णव संप्रदाय के आचार्य रंगदेशिक स्वामी के तपोमय जीवन से प्रभावित हुए और उनके शिष्य बने। स्वामीजी ने दोनों को दीक्षित कर दक्षिण यात्रा करवाई। उसी समय श्रीगोदादेवी को रंगमन्नार के साथ ब्रज में प्रतिष्ठित करने की अपनी इच्छा भी जता दी। बस यहीं से श्रीरंगमंदिर के निर्माण का सूत्रपात हुआ, जिसकी पूर्ति के लिए सेठ लक्ष्मीचंद, राधाकृष्ण और गोविंद दास ने अपना तन, मन और धन स्वामीजी के चरणों में समर्पित कर दिया।

श्रीस्वामी रंगदेशिक ने सेठ भाईयों द्वारा दिए गए विपुल धन से संवत् 1890 सन् 1833 में करीब 185 साल पहले मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया। जिसमें तोताद्रि स्वामी की अगुवाई में श्रीगोदारंगमन्नार भगवान का मूल विग्रह व उत्सव मूर्ति तथा श्री गरुड़, श्रीसुदर्शन, श्रीविष्वकसेन, श्रीवेणुगोपाल आदि भगवान की बड़े समारोह के साथ प्रतिष्ठा की। तब से बराबर पांचरात्र आगम विधि से भगवान की सेवा होती आ रही है। जिसमें उष: काल, आगमनकाल, समाराधनकाल, इज्याकाल, शयनकाल की सेवा मुख्य है। वर्तमान में श्रीरंगजी मंदिर रामानुज संप्रदाय के उत्कर्ष में सहभागी होते हुए धर्म प्रचार में संलग्न है। वर्तमान पीठाधीश्वर स्वामी गोवर्धनरंगाचार्य महाराज पूर्ण निष्ठा से भगवत कैंकर्यों को समयानुसार संपन्न करवाने में तत्पर रहते हैं।