दिल्ली में होकर भी अलग लगती हैं ये जगह, भाग-दौड़ भरी जिंदगी में ठहरने पर कर देती है मजबूर

दिल्ली में होकर भी अलग लगती हैं ये जगह, भाग-दौड़ भरी जिंदगी में ठहरने पर कर देती है मजबूर

By: priyanka singh
May 16, 16:05
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New Delhi: शोर-शराबे से भरी दिल्ली का हर कोना भागता-दौड़ता दिखाई देता हैं। इसी भाग-दौड़ भरी जिंदगी में दिल्ली का ये कोना कला प्रेमियों को सुकून देता हैं। किसी हाथों में किताब तो किसी के जुबां पर डायलाग यहां चलते फिरते लोगों में आप देख सकते हैं।

जी हां, दिल्ली का ये कोना जिसे बेफिक्रों का बसेरा कहा जाता हैं। बात कर रहे हैं दिल्ली के मंडी हाउस की, यहां ढोलक की थाप के साथ-साथ घुंघरूओं की आवाज राह चलते लोगों को भी कुछ देर रुकने के लिए मजबूर कर देती हैं। नाटक से लेकर नुक्कड़ नाटक सब कुछ यहां होते आप देख सकते हैं। मंडी हाउस को आप आर्टिस्टों की मंडी भी कह सकते हैं। 

हाथों में सिगरेट और जुबां पर डायलाग यहां आए हर आर्टिस्ट का स्टाइल हैं। यहां आने के बाद आपको लगेगा कि आप कहीं दिल्ली से बाहर आ गए हैं। मंहगे कपड़े, आंखों पर चश्मे, बड़ी गाड़ियां... इसे कोई नहीं देखता। हां अगर किसी चाय के नुक्कड़ पर बैठ को कोई शख्स हाथों में बीड़ी के कश लगा रहा हो और कोई दूर से आवाज लगाए .....दादा.. तो हर किसी नजर एक बार जरूर जाती हैं।

जी हां, ऐसा है कुछ मंडी हाउस का माहौल। इसलिए इसे थिएटर हब भी माना जाता है इसके साथ ही मंडी हाउस राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के लिए खास तौर पर मशहूर है। एन.एस.डी मां दाखिला लेने के लिए कई लोग आते हैं कोई अपने सपनों के लिए दौड़ता है तो कोई मंडी हाउस के भीड़ में खो जाता है। दिल्ली से दूर बैठे लोगों को ऐसा लगता है कि यहां सिर्फ एन. एस डी में ही नाटक होते हैं।

जबकि श्रीराम सेंटर, कमानी ऑडीटोरियम, एल.टी.जी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ऑडिटोरियम इन सभी में भी नाटक होते दिख जाएंगे। इसके अलावा कई ऐसे संस्था भी हैं जो कलाकारो को ट्रेनिंग देते हैं। डांस, म्यूजिक और एक्टिंग की संस्थाए यहां से गुजरने वालों को न सिर्फ चौंकाती है बल्कि भाग-दौड़ भरी जिंदगी में थोड़ा सुकून भी देती हैं। 

बॉलीवुड में एंट्री लेने के सपने देखने वाले कलाकार यहां एक बार जरूर आते हैं। इरफान खान, पंकज त्रिपाठी, मनोज बाजपयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे की कलाकार हैं बॉलीवुड से दिल्लगी करने से पहले मंडी हाउस से की थी। दौड़ती गाड़ियों के बीच कलाकारों के बोलते डायलाग आपका ध्यान एक बार जरूर खींच सकती हैं। अगर आप वहां से गुजरे तो एक-एक सीन के लिए बार-बार रिटेक करते कलाकार और उनपर झुंझलाते हुए डायरेक्टर आसानी से मिल जाएंगे।

शाम के वक्त मंडी हाउस का एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है। जब आम दिनचर्या में बंधे लोग शाम में अपने अपने दफ्तरों से निकलते हैं तो उन्हें घर जाने की जल्दी होती हैं। वहीं इसके विपरीत रंगमंच और कला की दुनिया में रह रहे लोगों को इस रफ्तार की जिदंगी से कोई लेना-देना ही नहीं है।

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