जन्मदिन विशेष: चरवाही से सदन तक पहुँचने वाले नेता लालू

New Delhi: चरवाही से सदन तक पहुँचने वाले नेता। बिहार में पिछड़ो , दलितों के राजनीतिक उभार का हीरो। जन्म की तारीख दर्ज नहीं हो पाई  क्योंकि घर में कोई पढ़ा लिखा नहीं था। सरकारी कागजों में जो जन्म की तारीख दर्ज हुई उसी पर लालू अपना जन्मदिन मनाते हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव का आज जन्मदिन है। सरकारी कागजों में दर्ज जन्मदिन है 11 जून 1948। 
अक्टूबर 1990 देश ‘मंदिर वहीँ बनाएंगे’ के नारों से गूंज रहा था। भाजपा के कद्दावर नेता लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने देश भर में हलचल मचा रखी थी। जगह-जगह हिंसात्मक घटनाएं बढ़ रही थी। प्रशासन चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। मंदिर जैसे मुद्दे पर कौन राजनेता अपने राजनीतिक कॅरियर को दांव पर लगाएगा। 23 अक्टूबर 1990 रथ बिहार पहुंचती है और लालू ने रथ रोक दिया। अडवाणी गिरफ्तार कर लिए गए। लालू रातों-रात सेक्युलर राजनीति के बड़े नेता बन गए। एक भी बड़ा दंगा नहीं होने दिया। दंगाग्रस्त क्षेत्रों में वह खुद भी खुली जीप में पहुंचकर लोगों को एक रहने की सन्देश देते थे।

बीते चार दशकों से बिहार की राजनीति में लालू का छाप रहा हैं। आम चुनाव ख़त्म हो गया। बिहार में क़रीब 42 साल बाद यह पहला मौका था, जब किसी चुनाव में लालू नहीं थे। न रहने का नतीजा यह हुआ कि उनकी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिला। लालू प्रसाद पहली बार 1977 में बिहार के सारण से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। तब से बिहार की राजनीति में लालू ने अहम् भूमिका निभाया। एक समय में उन्हें किंग मेकर भी कहा जाता था। केंद्र की सरकार बनाने में उनकी अहम् भूमिका होती थी। लालू का जीवन फर्श से अर्श तक की कहानी को कहती है। एक राजनेता जिसका बचपन अभाव में बीता। जिसके पास पहनने के लिए कपडे नहीं थे। एक ही कपड़े को कई दिनों तक पहनते रहने की वजह से उसमें जुए पड़ जाते थे। ठंड की ठिठुरन से बचने के लिए पुआल और जुट के बोरों के सिवाय दूसरा कोई साधन नहीं था। एक दिन वह राजनीति का बादशाह बना।

लालू, कोर्ट से चारा घोटाला मामले में दोषी करार दिए जाने के बावजूद जिस तरह से उनकी पार्टी का 2015 और उसके बाद बिहार में हुए उपचुनावों में प्रदर्शन रहा, बिहार की राजनीति में हम उन्हें नकार नहीं सकते। लालू भले विकास के नाम पर पिछड़ गये हों लेकिन उन्होंने उन तबकों को आवाज दिया जो ऊँची जातियों के समक्ष बैठ तक नहीं पाते थे। बतौर रेलमंत्री लालू ने रेल को फायदा ही फायदा दिया। गरीब भी एसी कोच में चढ़ सके इसके लिए गरीबरथ ट्रेन चलाया। कुम्हारों के विकास के लिए ट्रेन में कुल्हड़ चाय चलाया।

लालू यादव अपने जीवन पर लिखी किताब ‘गोपालगंज से रायसीना’ में लिखते हैं कि -सत्ता ने उन्हें अहंकारी बना दिया था जिसकी वजह से वह पार्टी नेताओं की बातों को अनदेखा कर देते थे। बाद में उन्हें इसका अहसास भी हुआ”।

लालू ने अपने अंदाज में गवांरुपन को अपनाया और वही उनके स्वभाव का सबसे सहज हिस्सा है। बिहार के किसी भी मुख्यमंत्री ने आज तक अपनी सरकार के चपरासी को दिए गए दो कमरों के सरकारी आवास से राज्य का शासन नहीं चलाया। अपना हेलिकॉप्टर किसी खेत-खलिहान में उतरवाकर , उसमें गरीबों को बैठाकर चक्कर लगवाते थे। किसी के भी घर जाकर सत्तू खाना। कहीं पे भी सो जाना। लोगों के बीच बैठकर नाच-गाने का आनंद लेना यह सारी बातें लालू को आम लोगों से जोड़ती हैं। हमारी सुन्दरता और चमकते कपड़ो का क्या फायदा अगर कोई उससे असहज हो रहा हो।