इस तरह हुआ था बाबा गोरखनाथ का जन्म, बेहद रोचक है ये पौराणिक कथा

New Delhi: गुरु गोरखनाथ (Guru Gorakhnath) एक योग सिद्ध योगी थे, इन्होंने हठयोग परंपरा का प्रारंभ किया। इनको भगवान शिव का अवतार माना जाता है।

गोरखनाथ (Guru Gorakhnath) को गुरु मत्स्येन्द्रनाथ का मानस पुत्र भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार एक बार गुरु मत्स्येन्द्रनाथ भिक्षा मांगने एक गांव गए। एक घर में भिक्षा देते हुए स्त्री बड़ी उदास दिखाई दी, तो गुरु ने पूछा क्या समस्या है?

स्त्री बोली- मेरी कोई संतान नहीं है। उस स्त्री को परेशान देख गुरु मत्स्येन्द्रनाथ ने उसको मंत्र पढ़कर एक चुटकी भभूत दी और पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद देकर चले गए। लगभग बारह साल के बाद गुरु मत्स्येन्द्रनाथ उसी गांव में फिर से आए और उस स्त्री के घर पहुंचे। दरवाजे के बाहर से आवाज लगाकर स्त्री को बुलाया और कहा, अब तो पुत्र बारह साल का हो गया होगा।

असलियत में वह स्त्री गुरु मत्स्येन्द्रनाथ की सिद्धियों से अनजान थी, इसलिए उसने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ द्वारा दी भभूत को खाने की बजाय गोबर में फेंक दिया था। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ की सिद्धि इतनी प्रबल थी कि भभूत बेकार नहीं जाती। स्त्री घबरा गई और सारी बात बताई कि मैंने भभूत को गोबर में फेंक दिया था।

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गुरु मत्स्येन्द्रनाथ ने कहा वह स्थान दिखाओ, वहां जाकर देखा तो एक गाय गोबर से भरे एक गड्ढे के ऊपर खड़ी है और अपना दूध उस गड्ढे में झलका रही है, तब गुरु ने उस स्थान पर बालक को आवाज लगाई। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ की आवाज से उस गोबर वाली जगह से एक बारह वर्ष सुंदर आकर्षक बालक बाहर निकला और हाथ जोड़कर गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के सामने खड़ा हो गया।

इस प्रकार बाबा गोरखनाथ का जन्म स्त्री के गर्भ से नहीं, बल्कि गोबर और गो द्वारा की जाने वाली रक्षा से हुआ था। इसलिए इनका नाम गोरक्ष पड़ा। इस बालक को गुरु मत्स्येन्द्रनाथ अपने साथ लेकर चले गए और आगे चलकर यही बालक गुरु गोरखनाथ बने। गोरक्षनाथ ने ही नाथ योग की परंपरा शुरू की और आज हम जितने भी आसन, प्राणायाम, षट्कर्म, मुद्रा, नादानुसंधान या कुण्डलिनी आदि योग साधनाओं की बात करते हैं, सब इन्हीं की देन है।