3 आ’तंकियों को मा’रकर श’हीद हुए थे किशन सिंह..अंतिम सांस तक दु’श्मनों से ल’ड़ते रहे

New Delhi : हम लोग चैन से सो सकें और सुरक्षित रह सकें इसके लिए आए दिन हमारे जवान अपनी शहादत देते हैं। वो अपने बाद अपनी वीरता की कहानी छोड़ जाते हैं। आज हम आपके लिए लाए हैं ऐसे ही वीर किशन सिंह की कहानी। किशन 16 दिसंबर 2018 को आ’तंकियों से मु’ठभे’ड़ में श’हीद हो गए थे।

अंतिम सांस लेने से पहले उन्होंने तीन आ’तंकियों को मा’र गिराया। इनमें माेस्ट वां’टेड जहूर ठोकर भी शामिल था। गांव के पवनसिंह राठौड़ ने बताया कि किशनसिंह साहसी थे। दीपावली पर गांव आए थे और करीब 10-12 रोज पहले ही ड्यूटी पर गए थे। श’हीद के मित्र और पड़ौसी रमेश बाटड़ ने बताया कि किशनसिंह ने पहले वीडियो कॉल कर पत्नी संतोष से बात की। इसके बाद आ’तंकि’यों के साथ हुई मु’ठभे’ड़ के दौरान किशनसिंह ने तीन आ’तंकि’यों को मा’र गि’राया। किशनसिंह नौकरी करते हुए हाल ही में बीए की थी। किशनसिंह हमेशा से निडर थे और ड्यूटी के दौरान ऑपरेशन को लीड करते थे।

किशनसिंह के दो बेटे हैं, पांच वर्षीय धर्मवीर व दो वर्षीय मोहित। ये दोनों पिता की शहादत से बेखबर हैं। करीब सात वर्ष पूर्व किशनसिंह के पिता का निधन हो गया था। बड़ा भाई जीवराजसिंह दिव्यांग है, जिसके कारण परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी किशनसिंह के कंधों पर ही थी। लांस नायक के पद पर तैनात किशनसिंह की पूरी बटालियन बीकानेर आ गई, लेकिन बड़े अधिकारियों ने उसे पुलवामा में ही रोक लिया था तथा एक-दो रोज बाद उन्हें बीकानेर भेजने की बात कही थी। वर्तमान में शहीद की पत्नी व बच्चे रतनगढ़ में निवास करते हैं।

शहीद किशनसिंह के मित्र रमेश बाटड़ के अनुसार 2009 के अंतिम महीने में किशनसिंह की फौज में भर्ती हुए थे। 2011 में पिता का निधन हो गया था। इसके बाद 2012 में किशनसिंह की शादी हुई थी। बाटड़ ने बताया कि दीपावली पर जब वे छुट्टी आए थे, तो उसने चर्चा की कि अब तो डेढ़-दो महीने की बात है, हमारी बटालियन बीकानेर आ जाएगी। किशनसिंह के बड़े भाई जीवराजसिंह व दो बहिने सरिता कंवर व सुमन कंवर है।