बाल दिवस : तो क्या आज ही है बच्चों की खुशी का दिन?

New Delhi: आज के इस फास्ट-फूड के दौर में बच्चों का बचपना भी अन्य चीजों की तरह गुम सा होता जा रहा है। जितनी तेजी से यह दुनिया बदल रही है, शायद उससे भी ज्यादा तेजी से बच्चों के अरमान बदल रहे हैं। टिक-टॉक और पब-जी जैसे वीडियोज की दुनिया ने उन्हें एक खोखले आभाषी संसार से रू-ब-रू कराया है। इन बातों पर बहस करने के लिए तो शायद 365 दिन भी काफी नहीं है। लेकिन आज के दिन का यह दस्तूर है कि इस पर एक लंबी जंग छेड़ी जा सकती है।

कहते हैं न मौका भी है दस्तूर भी है। आज यह मुहावरा बचपन को सहजने के लिए बिल्कुल सटीक बैठता है। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का आज जन्मदिन है जिसे समूचे भारत में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। बच्चों के प्रति उनके लगाव और प्यार ने ही उनके जन्मदिन को नन्हें-नन्हें मासूमों को समर्पित कर दिया है।

हर साल बड़े ही धूमधाम से मनाया जाने वाला बच्चों का यह वार्षिक त्योहार अपने-आप में कई सीख दे जाता है। लेकिन समय के साथ इसकी चमक भी फीकी पड़ती जा रही है। स्कूलों और कॉलेजों में इसे एक औपचारिक का तमगा दे दिया गया है। जमीनी सतह पर तो यह अब भी खोखली है, बस इसकी ऊपरी परत पर हर साल नए चादर चढ़ा दिए जाते हैं।

आश्वासन के नाम पर बच्चों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों पर लगाम कसने में देरी होना आम हो चला है। बाल-मजदूरी, बाल-तस्करी और बाल यौन शोषण जैसे अपराधों पर आंकड़ें जारी करने के अलावा और कुछ तरक्की नहीं हो रही है। इन अपराधों पर ताला लगाने और इन्हें जड़ से उखाड़ फेंकने की बातें तो नई-नई अन्य योजनाओं के बीच दब सी गई है।

हर साल इस दिन कई घोषणाएं होती हैं जिनमें एक सुरक्षित और खुशहाल बचपन के सपने दिखाए जाते हैं और फिर समय की धुंध उन्हें कहीं पीछे छोड़ देती है। आज फिर उन सभी वायदों को दुहराने का वक्त है और इन्हें मुकम्मल करने का पैमाना ढूंढने की जद्दोजहद्द है।