धधकने को तैयार पेट्रोल का सवाल

धधकने को तैयार पेट्रोल का सवाल

By: Arvind Mohan
May 16, 22:29
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अरविन्द मोहन:  कर्नाटक चुनाव के मद्देनजर क्या सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थोँ के दाम रोक दिये हैँ। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेँन्द्र प्रधान के साफ इंकार के बाद भी अगर यह मसला चर्चा से गायब नहीँ हो रहा है तो इसका कारण सबकी जरूरत बन गए पेट्रोल-डीजल के भाव बढते जान

और इधर कुछ समय से थम जाना है। पेट्रोलियम पदार्थ आज हर किसी की जरूरत हैँ और इनकी कीमतोँ का उतार-चढाव हर किसी के जीवन को प्रभावित करता है। ऐसे मेँ धर्मेन्द्र प्रधान का यह कहना तकनीकी रूप से तो सही है कि सरकार का कीमतोँ मेँ कमी-बेसी से कोई लेना-देना नहीँ है। लेकिन जब रोज बदलने वाले दामोँ मेँ 24 अप्रैल के बाद से कोई संशोधन नहीँ हुआ है और इस बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार मेँ कच्चे तेल की कीमतेँ बढी हैँ और डालर के मुकाबले रुपया कमजोर हुआ है तो उसका असर तो नजर आना चाहिये था। विपक्ष को इसमेँ तुरंत एक षडयंत्र सूंघने का अवसर हाथ लग गया और उसने हंगामा शुरु किया। फिर आठ मई हो इंडियन आयल लिमिटेड के प्रमुख संजय सिन्ह को बयान देना पडा कि कीमतोँ के ठहरने मेँ न तो सरकार का कोई हाथ है, न कर्नाटक चुनाव इसकी वजह हैँ। उनके बयान से भी विवाद थम जाएगा इसकी उम्मीद नहीँ है।

और जब तक यह क्रम आगे बढेगा तब तक कर्नाटक के चुनाव निपट जाएंगे जो शनिवार को ही होंगे। अगर इसके नतीजे प्रतिकूल हुए तो विपक्ष इस मसले को उठाता ही रहेगा। लेकिन नतीजे पक्ष मेँ हुए तो सब इस बात को भूल जाएंगे। और तय मानिये कीमतेँ तब बढेंगी ही। 24 अप्रैल को अगर कच्चे तेल की कीमत 78।84 डालर था और आठ मई को 81।61 पर पहुंच गया था। इस दौरान रुपया भी रिकार्ड गिरा है। इन दोनोँ का असर कीमतोँ पर पडेगा ही। और सामान्य गिनती से अनुमान लगाएँ तो पेट्रोल और डीजल की कीमतोँ मेँ अस्सी पैसे से लेकर एक रुपए लीटर तक की बढोत्तरी हो सकती है। अक्तूबर 2014 मेँ कीमतोँ का मामला पूरी तरह बाजार के हवाले कर दिया गया, इसलिये अब सरकार हाथ झाड सकती है। पहले महीने, फिर पखवाडे और बाद मेँ रोज के दाम तय करने का क्रम शुरु हुआ। ऐसी स्थिति मेँ अगर दो सप्ताह कीमतेँ रुकी रहेँ और उसे तय करने वाले कारकोँ मेँ बदलाव दिखे तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है। अगर पुराने तर्कोँ का सहारा लेँ तो इतने समय तक कीमतेँ न बढने से सरकार और तेल कम्पनियोँ को हजारोँ करोड का घाटा हो चुका होगा।

सरकार की तरफ उंगली उठने के दो बहुत साफ कारण हैँ। देश मेँ तेल लाकर बेचने और कीमतेम तय करने का अधिकार जिन तीन कम्पनियोँ- इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम, को है वे तीनोँ सरकारी हैँ। उनमेँ नियुक्ति-प्रोमोशन से लेकर संचालन तक के हर काम मेँ सरकार और उसके कायदे कानून ही चलते हैँ। दूसरा, और ज्यादा बडा कारण गुजरात और उत्तर प्रदेश चुनाव के समय भी कीमतोँ का स्थिर रहना और गुजरात वाले चुनाव के समय पहली बार करोँ मेँ कमी करना है। तब सरकार ने उत्पाद शुल्क मेँ पहली बार दो रुपए की कमी की थी। माना जा रहा है कि सरकार इस बार भी ऐसा चाहती थी पर वित्त मंत्रालय ने इसकी स्वीकृति नहीँ दी। जब तेल की कीमतेँ कम हुई थीँ तब सरकार ने आधा दर्जन बार से ज्यादा दफे उत्पाद शुल्क बढाकर ग्राहकोँ तक पूरा लाभ नहीँ जाने दिया था। वह घटी कीमत के चलते अपना राजस्व कम नहीँ होने देना चाहती थी। और एक बार जब लत लग गई तब कौन पास आती लक्ष्मी को रोकेगा।

यह अनुमान है कि इस अतिरिक्त कर से सरकारी खजाने मेँ सवा लाख से लेकर पौने दो लाख करोड रुपए का अतिरिक्त राजस्व हर साल जाता रहा है। सरकार के लिये अंतरराष्ट्रीय बाजार मेँ तेल की कीमतेँ कम होना किसी लाटरी से कम साबित नहीँ हुआ है। अब दिन बदले हैँ तो आते धन से मुन्ह मोडना मुश्किल फैसला है। और कर्नाटक चुनाव होँ न होँ, यह फैसला आसान नहीँ है। पर जिस सरकार को अगले साल आम चुनाव देखना हो वह बढती कीमतोँ की सच्चाई स एकिस तरह मुन्ह फेर सकती है-खासकर तब जब अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और करेंसी बाजार पर आपका कोई वश नहीँ चलता हो। और जब कीमतेँ बढेंगी तक एक उपाय तो उत्पाद कर अर्थात जीएसटी घटाना होगा ही। आज भले वित्त मंत्रालय न माने पर वह कब तक इसे टाल सकेगा। सभी चीजोँ पर जीएसटी लागू होने के दौर मेँ पेट्रोलियम पदार्थोँ को उससे बाहर रखना ही कितने समय चल पाएगा यह देखने की चीज होगी। सरकारी खजाने मेँ कुछ कम धन आए यह बात तो चल सकती है, पर बढे कर के चलते पेट्रोल-डीजल की कीमतोँ मेँ आग लगे यह किसी से बर्दाश्त नहीँ होगा-सरकारोँ से तो और भी नहीँ।

इसलिये उपरोक्त कारणोँ से सरकार भले बैकफुट पर नजर आती हो लेकिन कीमतोँ मेँ ज्यादा खेल वह कर नहीँ सकती-किसी राज्य के चुनाव होँ या राष्ट्रीय चुनाव होँ। उसके लिये बढे तैक्स कम करना और बढी कीमतोँ से बढने वाले राजस्व पर संतोष करना ही ज्यादा सही उपाय होगा। और भरोसा कीजिये कि मोदी सरकार भी यही करेगी, उसे भी यही करना पडेगा।

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