होली 2019: 500 साल पुरानी अनोखी परंपरा, होलिका की दहकती आग पार करते हैं लोग

New Delhi: होली (Holi 2019) का त्‍योहार मान्‍यताओं और परंपराओं का समागम है। देश भर में इस त्‍योहार को अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। कहीं रंगों से होली खेली जाती है तो कहीं फूलों से। कहीं लट्ठ बरसाए जाते हैं तो कहीं लड्डुओं की बौछार होती है।

विविधताओं के इस पर्व में एक जगह ऐसी भी हैं जहां होलिका (Holika) की आग में कूदने की भी परंपरा है। आइए देखते हैं कहां है यह स्‍थान और कौन दिखा पाता है यह दिलेरी…

मथुरा के पास स्थित है यह गांव

भगवान श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली मथुरी नगरी से 40 किलोमीटर दूर फालेन गांव की यह खास परंपरा है। यहां के स्‍थानीय लोगों का दावा है कि इस गांव में यह परंपरा पिछली 5 सदियों से बदस्तूर चली आ रही है। यहां होलिका दहन के अवसर पर एक विशेष मुहूर्त निकाला जाता है और पुजारी उसी मुहूर्त पर होली की आग में से कूदकर निकलते हैं। आज तक इस परंपरा में कोई भी हताहत नहीं हुआ है।

यहां प्राचीन मंदिर और प्रह्लाद कुंड भी

यहां भक्‍त प्रह्लाद का एक प्राचीन मंदिर और प्रह्लाद कुंड भी है। परंपरा इस प्रकार है कि मंदिर का पुजारी पहले प्रह्लाद कुंड में स्‍नान करता है औ‍र फिर होलिका दहन की जलती लपटों में कूदकर उससे बाहर निकलता है। होली से पहले पंडा इस मंदिर में पूजा अनुष्‍ठान करवाता है और उसके बाद कुंड में स्‍नान करता है।

स्‍थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा यहां करीब 5 सदियों से चली आ रही है। जब कोई पुजारी इस करतब को दिखा पाने में असमर्थता व्‍यक्‍त करता है तो वह पूजा करने वाली अपनी माला को मंदिर में रख देता है। उसके बाद जो भी पुजारी इस माला को उठाता है उसे इस परंपरा का निर्वाह करना पड़ता है। गांव में इस दिन मेला जैसा लगता है और इस परंपरा को देखने के लिए विदेश तक से मेहमान यहां आते हैं।

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अन्‍न का कर देते हैं त्‍याग

जो पुजारी इस परंपरा का निर्वाह करते हैं वह होलाष्‍टक लगते ही यानी होली से 8 दिन पूर्व ही अन्‍न का त्‍याग कर देते हैं। होलिका की ऊंची लपटों की तपिश में आम आदमी जहां इसके नजदीक भी खड़ा होने में डरता है, पुजारी इस आग के दरिया को फलांगकर सही सलामत बाहर निकल आते हैं।

एक मान्‍यता यह भी

स्‍थानीय लोगों के बीच यह मान्‍यता है कि इसी गांव में होलिका अपने भतीजे भगवान विष्‍णु के भक्‍त प्रह्लाद को जलाने की चेष्‍टा से अग्नि में बैठी थी। वैसे बिहार के पूर्णिया जिले के सिकलीगढ़ के बारे में भी दावा किया जाता है कि यहां हिरण्यकश्यप की राजधानी थी और यहीं पर प्रह्लाद को जलाने का प्रयास किया गया था। हिमाचली लोककथाओं में होलिका का संबंध हिमाचल से बताया जाता है।