गुरुद्वारा,वो जगह जहां हिंदू-मुसलमान और सिख ईसाई नहीं, मिलते हैं तो सिर्फ इंसान और मन की शांति

New Delhi : आप किसी भी गुरुद्वारे में चले जाइए, वहां ना आपसे आपका धर्म पूछा जाएगा ना ही जाति। गुरुद्वरा जाने के लिए सिर्फ आपका दिल साफ होना चाहिए। एक ओंकार सतनाम करता पुरख…”, सुनकर आप अपने आप को सुकून की दुनिया में पाएंगे। आज हम आपको देशभर के सबसे प्रसिद्ध गुरुद्वारों के बारे में बता रहे हैं। जहां आपको सिर्फ एक बार जाकर ही परम शांति मिलेगी।

बंगला साहिब, नई दिल्ली : दिल्ली के बीचों बीच बना गुरुद्वारा बंगला साहिब देश के प्रसिद्ध गुरुद्वारा में से एक है। यह गुरुद्वारा पहले राजा जय सिंह की हवेली थी, जिसे बाद में गुरु हरकिशन जी की याद में एक गुरुद्वारे में तब्दील कर दिया गया। शुरुआती दिनों में इसे जयसिंहपुरा पैलेस कहा जाता था, जो बाद में बंगला साहिब के नाम से मशहूर हुआ।

गुरुद्वारा हरमिंदर साहिब/स्वर्ण मंदिर, अमृतसर पंजाब : अमृतसर के इस गुरुद्वारे को हरमिंदर साहिब, श्री दरबार साहिब और स्वर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता हैं। युवाओं में यह गुरुद्वारा ‘गोल्डन टेम्पल’ के नाम से भी प्रसिद्ध है। सोने से ढका ये गुरुद्वारा सिर्फ देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसे भारत के मुख्य धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस गुरुद्वारे को बचाने के लिए महाराजा रणजीत सिंह जी ने इसके ऊपरी हिस्से को सोने से ढंक दिया था, इसलिए इसे स्वर्ण मंदिर का नाम भी दिया गया था। यहां जाकर आप ना सिर्फ भक्तिमय हो जाते हैं बल्कि इसके आस-पास मौजूद स्ट्रीट मार्केट से शॉपिंग भी कर सकते हैं।

गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब, उत्तराखंड : गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है। उत्तराखंड की हसीं वादियों में मौजूद यह गुरुद्वारा समुद्र स्तर से लगभग 4000 मीटर की ऊंचाई पर है। बर्फबारी के कारण यात्रियों की सुरक्षा के लिए इसे अक्टूबर से अप्रैल तक बंद कर दिया जाता है। यह गुरुद्वारा बेहद सुंदर होने के साथ-साथ एक बहुत ही अच्छी वास्तु कला का भी उदाहरण है। प्राकृतिक सुकून के साथ उत्तराखंड के हेमकुंड साहिब में आपको आध्यात्मिक सुख की भी प्राप्ति होती है।

हजूर साहिब गुरुद्वारा, महाराष्ट्र : हजूर साहिब सिखों के 5 तख्तों में से एक है। यह महाराष्ट्र के नान्देड नगर में गोदावरी नदी के किनारे स्थित है। इस गुरुद्वारा को ‘सच खण्ड’ के नाम से भी जाना जाता है। गुरूद्वारे के भीतर के कमरे को ‘अंगीठा साहिब’ कहा जाता है। मान्यता है कि इस कक्ष में केवल ‘ब्रह्मचारी’ सेवक ही सेवा कर सकता है, इसके अलावा यहां किसी भी अन्य सेवक को जाने की अनुमति नहीं है। इतिहास के मुताबिक इसी स्थान पर 1708 में गुरु गोबिंद सिंह का अंतिम संस्कार किया गया था। महाराजा रणजीत सिंह के आदेश के बाद इस गुरूद्वारे का निर्माण सन 1832-1837 के बीच हुआ था।