इंजीनियरिंग के हौवा ने मारे हैं लाखों सपने और जिंदगियां

New Delhi: गाँव से लेकर शहर तक आज भी जिसका जलवा कायम है उसका नाम इंजीनियरिंग और मेडिकल है। गणित समझ नहीं आया तो बायोलॉजी ले लिया, बायोलॉजी समझ नहीं आया तो गणित। बारहवीं में अगर गणित है तो इंजीनियरिंग और बायोलॉजी है तो मेडिकल। इसका कारण सिर्फ यही था कि जितना भाव इंजीनियरिंग और मेडिकल को मिला शायद ही किसी और स्ट्रीम के छात्रों को मिला। ऐसा समझा जाता कि इतिहास-भूगोल या फिर गणित और बायोलॉजी के अलावा दूसरा कोई और सब्जेक्ट पढ़ने वाले छात्र कमजोर हैं। वो कुछ भी नहीं कर सकते। वो माँ-बाप जो शिक्षा के बारे में कुछ नहीं जानते लेकिन अपने बेटे/बेटियों को पढ़ाना चाहते हैं उनके दिमाग में भी केवल दो ही ऑप्शन डाले जा रहे हैं इंजीनियरिंग और मेडिकल।

बेटे को इंजीनियरिंग में दाखिला मिलते ही रिश्ते आने लगते हैं। लाखों का दहेज़ , चारपहिया गाड़ी। यह दूसरा सबसे बड़ा कारण है, जिसने लाखों सपने कुचल दिए , जो लेखक बनना चाहते थे , कृषि वैज्ञानिक, अध्यापक या फिर इन दोनों को छोड़कर कुछ और। इंजीनियरिंग में दाखिला लेने के लिए तैयारी कराने वाले कोचिंगों की फीस लाखों में है। गरीब माँ-बाप लाखों का कर्ज ले रहे हैं। तनाव में बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन जब वह इंजीनियर बन जाते हैं तो उनके पास नौकरी नहीं है। साल 2017-18 में गैर-प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ाई पूरा करने वाले 7.93 लाख में से केवल 3.59 लाख छात्रों का ही प्लेसमेंट हो पाया। यह जानकारी खुद केंद्रीय मंत्री मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने लोकसभा में दी।

इंजीनियरिंग की हौवा ने लाखों जिंदगियां बर्बाद कर दी हैं। मैं एक अच्छा लेखक और अच्छा कॉमेडियन बन सकता था। लेकिन आस-पास के सभी पढ़े लिखे लोगों के बेटे और बेटियां  या तो इंजीनियरिंग की तैयारी करने में जुटे थे या फिर मेडिकल की। कोई और ऑप्शन के बारे में न जानने के कारण मैं भी उसी भीड़ में शामिल हो गया जिस तरफ सब जा रहे थे । मेरे साथ मेरे शहर से आये किसी इंजीनियर को नौकरी नहीं मिल पाई, सब आज दूसरी नौकरी की तैयारी में जुटे हैं जो लाखों बचाकर कोई और पढ़ाई करके भी किया जा सकता था।

इंजीनियरिंग का हौवा इस कदर बढ़ा कि चहुंओर इंजीनियरिंग कॉलेज खुलने लगे। भले ही वो इंजीनियरिंग कॉलेज के मानक को न पूरा करते हों। न ही उनके पास ढंग के अध्यापक हैं और न ही उनके पास प्रैक्टिकल के लिए जरुरी उपकरण हैं। उत्तर-प्रदेश में केवल डॉक्टर ए० पी० जे० अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी से ही 600 से ज्यादा कॉलेज जुड़े हैं। यह आंकड़ा 900 के करीब था लेकिन बीच में कई कॉलेज बंद भी हुए। हाल ही में एस्पाइरिंग माइंड्स की नेशनल इम्प्लायबिलिटी ने एक रिपोर्ट तैयार किया जिसमें यह पाया गया कि 80 फीसदी इंजीनियर रोजगार के काबिल नहीं है। रिपोर्ट में 650 से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेजों के 1,50,000 इंजीनियरिंग छात्रों का अध्ययन किया गया है।