बच्चे ईश्वर के रूप होते हैं , तो फिर ईश्वर से मजदूरी क्यों?

New Delhi: जिस देश में बच्चों को ईश्वर का रूप माना जाता है उसी देश के होटलों में बच्चे बर्तन मांजते दिख जायेंगे। ईंट भट्ठों पर ईंट ढोते दिख जायेंगे। सार्वजानिक स्थलों पर भीख मांगते दिख जायेंगे। और इन सबके पीछे की वजह है अशिक्षा और गरीबी। गरीब का बच्चा काम करने के लिए ही नहीं पैदा हुआ? उसके भीतर भी सपने जन्म लें इस पर काम करने की जरुरत है। विकास की इस दौड़ में कोई भी पीछे न छूटे। सिर्फ भारत ही नहीं पुरे विश्व भर में बाल श्रम की समस्या एक चुनौती बनती जा रही है। विश्व भर में बाल श्रम को समाप्त करने के लिये हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत अंतर्राष्ट्रीय संगठन द्वारा वर्ष 2002 में की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य बाल श्रम की वैश्विक सीमा पर ध्यान केंद्रित करना और बाल श्रम को पूरी तरह से खत्म करने के लिये आवश्यक प्रयास करना है। इस बार का थीम है कि बच्चे काम नहीं करे बल्कि सपने देखें। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 12 करोड़ बाल मजदूर हैं। जिनकी उम्र 14 वर्ष से कम है।

बाल मजदूर भी बेरोजगारी के  कारण

भारत जैसा विकासशील देश इस वक़्त बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा है, पिछले दिनों ही एक रिपोर्ट आई कि भारत में 45 सालों में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है। बाल मजदूर बेहद कम पैसों में मजदूरी के लिए उपलब्ध हो जाते हैं , कहीं-कहीं तो उन्हें केवल खाना ही मिलता है। जहाँ एक नौजवान को मजदूरी करना चाहिए वहां बाल मजदूर काम पर लगा है। अगर बाल मजदूरी पर रोक लगे तो बेरोजगारी भी कम हो सकती है। कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इकलौता बिहार और झारखण्ड में अनुमानित 22,000 बच्चे माइका खानों में काम करतें हैं। अगर खान कोलेप्स कर गया तो सबकी जान तक जा सकती है।

क्या है भारतीय संविधान में बाल मजदूरी के बारे में
14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में या किसी भी खतरनाक जगहों पर काम करने के लिये नियुक्त नहीं किया जाएगा।

साल 2016 में बाल मजदूरी पर एक नया कानून आया …
बाल श्रम पर नये कानून को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मंजूरी दे दी है और अब किसी भी काम के लिए 14 साल से कम उम्र के बच्चे को नियुक्त करने वाले व्यक्ति को दो साल तक की कैद की सजा तथा उस पर 50,000 रुपये का अधिकतम जुर्माना लगेगा। हालाँकि स्कूल के बाद बच्चे अपने परिवार की मदद कर सकते हैं। एक सच यह भी है कि शिक्षा के आभाव में अधिकांश मां-बाप अपने काम में बच्चों को अपने साथ काम पर लगा देते हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार श्रम बच्चों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और नैतिक विकास को खतरे में डालते हैं। इतना ही नहीं, इसके कारण बच्चे सामान्य बचपन और उचित शिक्षा से भी वंचित रह जाते हैं। दुनिया भर में बाल श्रम में शामिल 152 मिलियन बच्चों में से 73 मिलियन बच्चे खतरनाक काम करते हैं। सेव द चिल्ड्रेन’ रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के आधे से अधिक बच्चों को गरीबी, संघर्ष और लड़कियों के खिलाफ भेदभाव का खतरा है।

पढ़िए अशोक वाजपेयी की एक कविता ‘बच्चे एक दिन’

बच्चे
अंतरिक्ष में
एक दिन निकलेंगे
अपनी धुन में,
और बीनकर ले आयेंगे
अधखाये फलों और
रकम-रकम के पत्थरों की तरह
कुछ तारों को ।

आकाश को पुरानी चांदनी की तरह
अपने कंधों पर ढोकर
अपने खेल के लिए
उठा ले आयेंगे बच्चे
एक दिन ।

बच्चे एक दिन यमलोक पर धावा बोलेंगे
और छुड़ा ले आयेंगे
सब पुरखों को
वापस पृथ्वी पर,
और फिर आँखें फाड़े
विस्मय से सुनते रहेंगे
एक अनन्त कहानी
सदियों तक ।

बच्चे एक दिन……

(रचनाकालः1986)