क्या था चिपको आंदोलन, उत्तराखंड में जब पूरी रात पेड़ों से चिपकीं रहीं 27 महिलाएं

New Delhi: 26 मार्च को ‘चिपको आंदोलन’ के 46 साल पूरे हो गए हैं। इस आंदोलन की शुरुआत चमोली के एक छोटे से गांव रैणी से पेड़ों की कटाई के विरोध के रुप में हुई थी, जिसका संचालन रैणी की गौरा देवी कर रही थीं। उन्होंने बेहद शांत तरीके से इसका विरोध किया था। यह विरोध जब चमोली से पूरे पहाड़ पर फैला तो इसे ‘चिपको आंदोलन’ का नाम दिया गया। चलिए आपको बताते हैं कि आखिर कौन थीं गौरा देवी और आंदोलन के पीछे क्या वजहें थीं?

कौन थीं गौरा देवी- गौरा देवी का जन्म 1925 में चमोली (उत्तराखंड) के लाता गांव में हुआ था। वह 12 साल की ही थीं, जब उनकी शादी पास के गांव रैणी के मेहरबान सिंह के साथ कर दिया गया था। शादी के 10 साल बाद ही उनके पति की मौ’त हो गई थी। उन दिनों भारत-तिब्बत के बीच व्यापार का खूब प्रचलन था। गौरा देवी उसी व्यवसाय में छोटे मोटे काम-धंधे करके अपने परिवार का पालन-पोषण करती थी। गौरा देवी कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन वेद-पुराण, रामायण, भगवद गीता, महाभारत आदि का पूरा ज्ञान था।

साल 1962 में भारत-चीन के बीच यु’द्ध छिड़ने के कारण तिब्बत-भारत के बीच व्यापार बंद हो गया। तब गौरा का बेटा चंद्रसिंह ऊनी कपड़ों का छोटे-मोटे स्तर पर कारोबार करके परिवार का भरण-पोषण करने लगा। यही वह समय था जब गौरा देवी घर की चौखट पार कर गांव के लोगों के सुख-दुख से जुड़ने लगीं। उन्हीं दिनों 1970 में अलकनंदा नदी में भयंकर बाढ़ आई। इस बाढ़ से जनजीवन तहस नहस हो गया।

रैली में गौरा देवी की हुंकार- राज्य सरकार ने चमोली के रास्ते सैनिकों के लिए नई सड़क बनाने की योजना बनाई थी। इसके साथ ही रास्ते में पड़ने वाले पेड़ों की कटाई शुरू हुई। बाढ़ झेल चुके चमोली के लोगों ने पेड़ों की कटाई का विरोध किया। इसी के तहत महिला मंडल की स्थापना हुई, जिसमें रेणी गांव को महिला मंडल का अध्यक्ष बनाया गया। वन विभाग ने लगभग ढाई हजार पेड़ों की कटाई की योजना बनाई थी। इनकी कटाई के विरोध में गौरा देवी ने 23 मार्च को गोपेश्वर में एक व्यापक रैली निकाली थी। रैली में गौरा देवी ने हुंकार लगाते हुए कहा कि जंगल हमारा मायका जैसा है, इसे हम यूं ही नहीं उजड़ने देंगे।

गौरा देवी से बनीं ‘चिपको वूमन’- गांव के लोगों को शांत करने के लिए वन विभाग ने सड़क निर्माण में हुए नुकसान का मुआवजा देने के लिए 26 मई को चमोली जिले में बुलाया। गांव के लोग चमोली पहुंचे। वन विभाग ने ठेकेदारों को रैणी गांव भेजा, ताकि वे बिना विरोध के पेड़ काट सकें। रैंणी गांव के ढाई हजार पेड़ों को काटने के लिए जब ठेकेदार वहां पहुंचे तो महिला मंडल की 21 सदस्यों के साथ गौरा देवी वहां पहुंच गयीं।

वे सब की सब पेड़ों को पकड़कर खड़ी हो गई, और ठेकेदार को चुनौती दी कि अगर हिम्मत है तो पहले हम पर कुल्हाड़ी चलाओ, इसके बाद ही पेड़ काट सकोगे। फिर क्या हुआ ठेकेदारों को अपने मजदूरों के साथ वापस जाना पड़ा। इस तरह गौरा देवी का चिपको आंदोलन सफल हुआ और वे ‘चिपको वुमेन’ के नाम से मशहूर हुईं। ‘चिपको वुमेन’ के नाम से मशहूर गौरा देवी का 4 जुलाई 1966 साल की उम्र में नि’धन हो गया