18 रुपए के लिए कैंटीन में बर्तन धोता था ये शख्स, आज साउथ इंडियन रेस्टोरेंट सागर रत्ना का है मालिक

18 रुपए के लिए कैंटीन में बर्तन धोता था ये शख्स, आज साउथ इंडियन रेस्टोरेंट सागर रत्ना का है मालिक

By: Rohit Solanki
June 13, 14:51
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New Delhi: देशभर में साउथ इंडियन फूड के शौकीन लोग सागर रत्ना रेस्टोरेंट के बारे में तो जरूर जानते होंगे। भारत में साउथ इंडियन फूड की ये सबसे बड़ी चेन है। लेकिन इस रेस्टोरेंट चेन की शुरुआत बड़ी ही दिलचस्प है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि सागर रत्ना रेस्टोरेंट चेन के मालिक जयराम बानन कभी 18 रुपए वेतन के लिए एक कैंटीन में बर्तन धोया करते थे। बानन ने कठिनाइयों से हार न मानते हुए अपने दम पर कुछ कर दिखाने की सोची और फिर खड़ा कर दिया करोड़ों का कारोबार। 

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जयराम बानन का जन्‍म मंगलौर (कर्नाटक) के पास स्थित 'उडुपी' में हुआ था। उनके पिता ड्राइवर थे और बहुत ही गुस्‍सैल स्‍वभाव के थे। कई दफा गलती करने पर पिता ने बानन की आंख में मिर्ची पाउडर तक डाल दिया था। जब जयराम बानन स्‍कूल एग्जाम में फेल हो गए तो पिता से पिटने की डर से 13 साल में ही घर से भाग गए। घर से भागने के लिए उन्होंने अपने पिता के पॉकेट से कुछ पैसे निकाले और मंगलौर से मुंबई जाने वाली बस में सवार हो गए। बानन 1967 में बॉम्बे (आज का मुंबई) पहुंचे।

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कई दिनों तक मुंबई में भटकने के बाद जयराम को एक छोटी कैंटीन में नौकरी मिली। इसमें प्‍लेट धोने से लेकर टेबल साफ करने का काम था। इसके लिए मासिक पगार 18 रुपए मिलती थी। जयराम ने प्‍लेट धोने और टेबल साफ करने का काम छह साल तक किया। प्‍लेट धोने के लिए सोडा का इस्‍तेमाल होता था,‍ जिससे इनका हाथ बुरी तरह से खराब हो गया था। इसके बावजूद बानन अपने काम में डटे रहे।

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जयराम उडुपी समुदाय से ताल्‍लुक रखते हैं। इसी समुदाय ने मुंबई में मसाला-डोसा से सभी को परिचय कराया है। मुंबई में बहुत सारे कॉम्‍पिटीटर को देखते हुए बानन ने दिल्‍ली का रुख करना बेहतर समझा। 1973 में जयराम मुंबई से दिल्‍ली आ गए। दिल्‍ली में इनका भाई एक उडुपी रेस्‍टोरेंट में काम करता था। यहां पर आकर बानन ने 1974 में गाजियाबाद की सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्‍स की कैंटीन का टेंडर लिया। यहां उन्होंने 2000 रुपए लगाए और यहीं से उनकी किस्मत बदल गई। 

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कैंटीन में लोगों को इनका खाना खूब पसंद आने लगा। कैंटीन के जरिए अगले कुछ सालों में जयराम ने खूब कमाई की, लेकिन क्वालिटी से कभी समझौता नहीं किया। जयराम बताते हैं कि उन दिनों उडुपी का डोसा सिर्फ हल्दीराम का डोसा मिलता था। हालांकि, वो प्रॉपर उडुपी स्टाइल और टेस्ट वाला नहीं था। असली उडुपी डोसा उस वक्त दिल्ली के दो महंगे होटलों में ही परोसा जाता था।

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बस यहीं से जयराम ने सोचा कि महंगे होटलों में मिलने वाला डोसा ही अब वो बेंचेंगे लेकिन सिर्फ चाट पकौड़ी की कीमत पर। साल 1986 में जयराम ने पांच हजार रुपए जोड़कर दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी में 40 सीटों वाला एक आउटलेट खोला जिसका नाम रखा गया 'सागर'। इस आउटलेट में इडली, डोसा सांभर वगैरह बेचा जाने लगा। पहले ही दिन जयराम ने यहां से 408 रुपए की कमाई की। पूरे हफ्ते में उन्होंने लगभग 3 हजार रुपए के आसपास कमाए, लेकिन दुकान का एक हफ्ते का किराया 3 हजार रुपए से ज्यादा था। बावजूद इसके उन्होंने क्वालिटी से कोई समझौता नहीं किया। सुबह सात बजे से लेकर आधी रात तक कमरतोड़ मेहनत के बाद जयराम का कारोबार चल निकला।

जयराम बताते हैं कि दिल्ली के जिन दो होटलों में उस वक्त उडुपी डोसा मिलता था, वो मेरे आने से परेशान हो गए और उनमें से एक होटल के मालिक ने दूसरे को खरीद लिया और पूरी तरह मेरे कारोबार के खिलाफ हो गया। जयराम बताते हैं कि मैंने उसी समय अपने आउटलेट को रेस्टोरेंट की शक्ल दे डाली और नाम रखा सागर रत्ना। खाने का प्राइस 20 पर्सेंट बढ़ाया और रेस्टोरेंट जल्द ही पॉप्युलर हो गया। धीरे-धीरे पूरे दिल्ली एनसीआर में 35 रेस्टोरेंट खड़े कर दिए। वो बताते हैं कि यहां आम आदमी से लेकर बड़े-बड़े नेता भी डोसा खाने आते थे। खासकर पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी तो अक्सर यहां आ जाया करते थे।

वो बताते हैं कि इसके बाद पहली बार हमने लुधियाना के होटल महाराजा में अपनी फ्रेंचाइजी खोली। इसके बाद उत्तर भारत के कई शहरों में इसका विस्तार किया और धीरे-धीरे कारोबार अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और सिंगापुर तक पहुंच गया। वो बताते हैं कि 2001 में डिफेंस कालोनी में ही सागर रत्ना से थोड़ी दूरी पर उन्होंने कोस्टल फूड के लिए 'स्वागत' नाम से रेस्टोरेंट खोला जो आज विदेशी पर्यटकों में खासा लोकप्रिय है। मौजूदा समय में जयराम 90 आउटलेट के मालिक हैं, जिनमें सागर रत्ना के साथ स्वागत के 17 आउटलेट भी शामिल हैं। हर साल 20-25 प्रतिशत तक मुनाफा हो रहा है। इस वक्त सागर रत्ना की ब्रांड वैल्यू 200 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है।

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