महाकाल के शिवलिंग को छूते ही मुर्दा हो गया जिंदा..लोगों ने अपनी आखों से देखा भोलेनाथ का चमत्कार

New Delhi :  दुनिया में एक से बढ़कर एक चमत्कार देखने को मिलते हैं, चाहे वो प्राकृतिक हों या फिर कृत्रिम। लेकिन आपको एक ऐसे चमत्कार के बारे में बता रहे हैं, जिसे सुनकर आपका रोम-रोम पुलकित हो उठेगा। हम बात कर रहे हैं कटनी शहर के प्रमुख सिद्ध पीठ मधई मंदिर की।

यहां पर शिवलिंग में विराजे भगवान भोलेनाथ की अपार कृपा भक्तों पर 200 साल से बरस रही है। आपको सुनकर ताज्जुब होगा कि यहां पर एक मुर्दा  शिवलिंग के स्पर्श करवाते ही जीवित हो गया था। लोगों ने ये चमत्कार अपनी आंखों से होता देखा था। घनघोर जंगल से प्रकटे स्वयं-भू शिवलिंग के इस मंदिर में अनेकों रहस्य समाए हुए हैं। ऐसे अस्तित्व में आया मंदिर :  कटनी शहर के विश्वकर्मा पार्क में स्थित है यह प्राचीन शिव मंदिर। इस मंदिर को श्रद्धालु मधई मंदिर के नाम से जानते हैं। मंदिर के पुजारी श्रीरामकृष्णाचार्य महाराज के अनुसार लगभग 200 साल पहले यह मंदिर अस्तित्व में आया। एक भक्त को भगवान भोलेनाथ ने स्वप्न दिया और भूमि से प्रकट हुए।

ये है कमाल का रहस्य :  मधई मंदिर के पुजारी श्रीरामकृष्णाचार्य के अनुसार मंदिर में कई ऐसे चमत्कारी तथ्य सामने आए हैं जो भगवान भोलेनाथ की कृपा के प्रमाण हैं। 116 साल पहले मैहर क्षेत्र के ग्राम पोड़ी निवासी बैजनाथ सिंह की मौत हो गई थी, लेकिन उसके पुत्र को भोलेनाथ ने स्वप्न दिया कि उसे मंदिर लेकर आओ। जब मुर्दे को लेकर परिजन मंदिर पहुंचे और भगवान के दरबार में लिटाया तो एक घंटे के अंदर वह जीवित हो उठा। उसके बाद से उसने पूरी उम्र भगवान की सेवा में बिताई। इसके साथ कि लोगों की कई असाध्य बीमारियां शिवजी की कृपा से ठीक हुईं। आज भी लोग अपनी अर्जी लेकर बाबा के दरबार में पहुंचते हैं।

पुजारी बिहारी महाराज ने बताया कि यह शहर का सबसे पुराना शिव मंदिर है। सन 1817 में एक शिवभक्त को भोलेनाथ ने स्वप्न दिया कि मैं इस जंगल में हूं। शिवलिंग का खनन कराकर प्राण प्रतिष्ठा कराओ। शिवभक्त ने स्वप्न के बारे में परिजनों सहित शहर के लोगों को बताया। उसके बाद जमीन को खोदकर शिवलिंग निकाला गया और स्थापना की गई।

छोटे से मंदिर में विराजे भगवान भोलेनाथ की 1950 में कृपा बरसी और मंदिर ने बड़ा आकार लिया। मधई मंदिर के सर्वराहकार गोयनका परिवार द्वारा मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कराया गया। विशेष नक्कासी वाला मंदिर तैयार हुआ और फिर पुन: भोलेनाथ की बड़े मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कराई गई।

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