बसंत पंचमी 2019: इस मंदिर में है सरस्वती मां का निवास, ऋषि वेद व्यास ने कराया था निमार्ण

New Delhi: मां सरस्वती जी का जन्मदिन जिसे हम बसंत पंचमी (Basant Panchami) के रूप में मनाते हैं इस साल 10 फरवरी यानी आज मनाया जाएगा। भारत में वैसे तो सरस्वती माता के कई मंदिर है लेकिन आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले के मुधोल क्षेत्र के बासर गांव में स्थित मंदिर को सरस्वती माता का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर को ऋषि वेद व्यास द्वारा बनाया गया था। गोदावरी के तट पर बने इस मंदिर जैसा ही एक अन्य मंदिर जम्मू कश्मीर के लेह में है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां शारदा का निवास दंडकारण्य और लेह में माना जाता है।

मंदिर को लेकर मान्यता

इस स्थित मंदिर को लेकर मान्सता है कि महाभारत के रचयिता महाऋषि वेद व्यास जब मानसिक उलझनों से उलझे हुए थे तब शांति के लिए तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े, अपने मुनि वृन्दों सहित उत्तर भारत की तीर्थ यात्राएं कर वह दंडकारण्य (बासर का प्राचीन नाम) पहुंचे, और गोदावरी नदी के तट पर स्थित इस स्थान पर कुछ समय के लिए रुक गए थे।

मां सरस्वती के मंदिर से थोडी दूर स्थित दत्त मंदिर से होते हुए मंदिर तक गोदावरी नदी में कभी एक सुरंग हुआ करती थी, जिसके द्वारा उस समय के महाराज पूजा के लिए आया-जाया करते थे। यहीं वाल्मीकि ऋषि ने रामायण लेखन प्रारंभ करने से पूर्व मां सरस्वती जी को प्रतिष्ठित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया था। इस मंदिर के निकट ही वाल्मीकि जी की संगमरमर की समाधि बनी है।

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मंदिर के गर्भगृह, गोपुरम, परिक्रमा मार्ग आदि इसकी निर्माण योजना का हिस्सा हैं। मंदिर में केंद्रीय प्रतिमा सरस्वती जी की है, साथ ही लक्ष्मी जी भी विराजित हैं। सरस्वती जी की प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में 4 फुट ऊंची है।

मंदिर में एक स्तंभ भी है जिसमें से संगीत के सातों स्वर सुने जा सकते हैं। यहां की विशिष्ट धार्मिक रीति अक्षर आराधना कहलाती है। इसमें बच्चों को विद्या अध्ययन प्रारंभ कराने से पूर्व अक्षराभिषेक हेतु यहां लाया जाता है और प्रसाद में हल्दी का लेप खाने को दिया जाता है। बासर गांव में 8 ताल हैं जिन्हें वाल्मीकि तीर्थ, विष्णु तीर्थ, गणेश तीर्थ, पुथा तीर्थ कहा जाता है।

इस मंदिर का निर्माण चालुक्य राजाओं ने देवी सरस्वती के सम्मान में किया था। आजकल इस मंदिर में पंचमी और नवरात्री जैसे त्योहार बड़े पैमाने पर मनाये जाते हैं। हिंदुओं का एक प्रसिद्ध रिवाज़ ‘अक्षर ज्ञान’ भी इस मंदिर में मनाया जाता है। यह एक महत्वपूर्ण हिंदू रिवाज़ है और एक बच्चे के जीवन में औपचारिक शिक्षा के प्रारंभ को दर्शाता है।