शाही शासन के अधीन है छटवां अमीर देश सऊदी अरब, ‘तख्तापलट के डर’ से मीडिया और सेना को नहीं आजादी

New Delhi: पिछले दिनों में सऊदी अरब के शाही शासन ने अपनी सत्ता, कूटनीति, नियमों और कानूनों में कई अहम बदलावों को अजांम दिया, जिसके कारण पूरे देश में सिर्फ सऊदी अरब का ही डंका बजने लगा। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने ना सिर्फ महिलाओं के हित में कई स्वतंत्र कानून बनाए बल्कि देश को मनोरंजन जगत का भी अनूठा तोहफा दिया।

जानकारी के लिए एबता दें कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस द्वारा किए गए इन बदलावों को सऊदी के इतिहास में मील का पत्थर बताया जाने लगा, क्योंकि जहां महिलाओं को अकेले सड़क चलने तक की आजादी नहीं थी, वहां महिलाओं को ड्राइविंग करने का अधिकार दिया और जिस देश में महिलाओं को घर बाहर निकलकर शौक-मौज करने की इजाजत नहीं थी, उसी देश में महिलाओं को मैच देखने की अनुमति दी गई। इन बदलावों के बाद जहां दुनियाभर से सऊदी अरब को सराहना मिल रही थी तो वहीं कुछ मुस्लिम चरमपंथियों ने इन बदलावों का जमकर विरोध किया।

सऊदी अरब में अंजाम दिए गए इन बदलावों को कई क्षेत्रों में स्वतंत्रता का तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन स्वतंत्रता सिर्फ कुछ ही क्षेत्रों में दी गई, यहां पर ना तो लोकतंत्र है और ना ही प्रेस को आजादी है। इसके पीछे कुछ और नहीं बल्कि यहां के राजशाही शासन की राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं ही हैं। इस मामले में विदेशी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी की सेना आज इतनी कमजोर इसलिए है, क्योंकि राजशाही को तख्तापलट की आशंकाएं रहती हें। इसी कारण अपने मुस्लिम बहुल पडोसी देशों से दूर अमेरिका के साथ काफी करीबी भी बनाए रखता है।

हालांकि एक बार अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप ने भी खुलासा किया था कि सऊदी अरब में राजशाही का टिकाव सिर्फ अमेरिकी सेना के कारण ही संभव है। उन्होंने बताया था कि अमेरिकी सेना के सहयोग के बिना वहां की राजशाही ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाएगी, इसलिए उसे अमेरिकी सेना को भुगतान करने के बारे में सोचना चाहिए। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही सामने आता है कि आखिर सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा का ही डर है या कोई और भी समस्याएं सऊदी राजशाही को डर के साए में जीने पर मजबूर कर रही है।

इन सवालों के पीछे कुछ और नहीं बल्कि पिछले दो वर्षों में लिए गए कुछ फैसलों को बताया जा रहा है। जिसमें शिया धर्मगुरू निम्र अल निम्र के साथ-साथ 47 लोगों को फांसी, यमन के साथ युद्धविराम का खात्मा, ईरान के साथ राजनयिक संबंधों का पतन और कतर की नाकेबंदी बताई जा रही हैं। इतना ही नहीं, सूत्रों की मानें तो आज भी शाही परिवार आतंरिक मतभेदों का सामना कर रहा है। वहीं शाही को परिवार को इस्लामिक स्टेट और अलकायदा के साथ-साथ सुन्नी चरमपंथियों का भी डर सताता रहता है।

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