इस क्रांतिकारी ने बनाया था सबसे बड़ा प्लान,अगर कामयाब होता तो 1915 में मिल जाती देश को आजादी

इस क्रांतिकारी ने बनाया था सबसे बड़ा प्लान,अगर कामयाब होता तो 1915 में मिल जाती देश को आजादी

By: Naina Srivastava
August 13, 08:08
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New Delhi: भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु इन सभी क्रांतिकारी का नाम तो सभी जानते हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में एक नाम ऐसा भी है जो कहीं गुम हो गया है। इस गुम नाम में ऐसा ही एक नाम है यतीन्द्रनाथ मुखर्जी का। भारत को आजादी मिली 15 अगस्त 1947 को। लेकिन एक ऐसे क्रांतिकारी भी हैं जिनका नाम है यतीन्द्रनाथ मुखर्जी। कहा जाता है कि क्रांतिकारी यतीन्द्रनाथ देश को आजाद कराने के लिए कई तरह की योजनाएं बनाए थे। अगर यतीन्द्रनाथ का प्लान कामयाब होता तो देश को आजादी के लिए सालों इंतजार  नहीं करना पड़ता। साल 1915 में ही देश को आजादी मिल गई होती। 

यतीन्द्रनाथ मुखर्जी बाघा जतिन के नाम से जाने जाते थे। कहते हैं कि देश को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए बाघा जतिन ने एक ऐसी योजना बनाई थी कि देश 1915 में ही आजाद हो गया होता। दरअसल, उन दिनों होता ये था कि बाघा जातिन के लोग अंग्रेजों को जहां अकेला देखते उनकी पिटाई वहीं कर देते। कहा जाता है कि एक बार उन्होंने एक साथ आठ अंग्रेजों को पीटा था। \

यतीन्द्रनाथ मुखर्जी बंगला के नादिया जिले में पैदा हुए थे, जो अब बांग्लादेश में है। पिता की मौत के बाद उनकी परवरिश उनकी मां ने की थी। यतीन्द्रनाथ खेलकूद में माहिर थे। यतीन्द्रनाथ ने कलकत्ता सेंट्रल कॉलेज में दाखिला लिया। तभी वे स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आए। इसी दौरान स्वामी जी ने उन्हें कुश्ती के दाव पेच सीखने के लिए एक अखाड़े में भेज दिया। वहीं से उनके मन में देश के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा प्रबल हुई।

 साल 1900 में क्रांतिकारियों के एक संगठन का निर्माण हुआ। जिसमें बाघा जतिन की अहम भूमिका थी। बंगाल, उड़ीसा और बिहार में संगठन का विस्तार किया गया। इसी दौरान साल 1905 में ब्रिटेन के राजकुमार कलकत्ता में थे।  बाघा जतिन ने वारीन्द्र घोष की मदद से देवघर में एक बम फैक्ट्री की स्थापना की। अलीपुर बम कांड में भी जतिन का नाम आया। 

देश को आजाद करवाने के लिए यतीन्द्रनाथ ने अब तक का सबसे बड़ा प्लान बनाया। इतिहास में इस योजना को जर्मन प्लॉट या हिंदू-जर्मन कांस्पिरेसी के नाम से जाना गय़ा। अगर वो प्लान कामयाब हो जाता तो हमारा देश को 1915 में ही आजाद हो जाता।उसी प्लान के मुताबिक फरवरी 1915 में 1857 की तरह क्रांति करने की योजना थी। मगर इसी दौरान पंजाब 23वीं कैवलरी के एक विद्रोही सैनिक के भाई कृपाल सिंह ने क्रांतिकारियों को धोखा दिया और उनकी सारी योजना अंग्रेजी सरकार तक पहुंचा दी। सारे प्लान पर पानी फिर गया।

इधर, अंग्रेजी अफसरों को जतिन और उनके साथियों की ख़बर लग चुकी थी। वे कप्टिपाड़ा गांव में छिपे थे। बाघा का आखिरी वक्त आ गया था। उन्हें चारों तरफ से घेर लिया गया। उनका साथी चित्तप्रिय उस वक्त उनके साथ था। दोनों तरफ़ से गोलियां चलने लगी। इसी बीच जतिन का शरीर गोलियों से छलनी हो गया। मरने से पहले जतिन ने बयान में कहा कि गोली उन्होंने और चित्तप्रिय ने चलाई थी। वहां मौजूद बाकी अन्य लोग निर्दोष हैं। इसके बाद बालासोर अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया।

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