Chieldren's Day Special: 'मजदूरी' में दबा बचपन, क्या आप लेंगे किसी ऐसे ही मासूम की जिम्मेदारी?

Chieldren's Day Special: 'मजदूरी' में दबा बचपन, क्या आप लेंगे किसी ऐसे ही मासूम की जिम्मेदारी?

By: shailendra shukla
November 14, 16:11
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आज भी देश में अधिकांश बच्चे शिक्षा से वंचित हैं, नवजात कुपोषण के शिकार हैं, बचपना 'बाल मजदूरी' के नीचे दबा है। आम लोगों की तो गलती है ही लेकिन सरकार भी 'बचपन' को सिर्फ कागजों पर ही बढ़ावा देती है।

New Delhi: देश के पहले Prime Minister पंडित जवाहर लाल नेहरू की जयंती 'बाल दिवस' के तौर पर हम दशकों के मनाते चले आ रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे बच्चों के लिए हम कुछ नहीं करते जिन्हें हमारे सहारे की जरूरत हो। आज भी देश में अधिकांश बच्चे शिक्षा से वंचित हैं, नवजात कुपोषण के शिकार हैं, बचपना 'बाल मजदूरी' के नीचे दबा है।

(ऐसी तस्वीरें दु:खद हैं। किसी भूखे को खाना खिलाना बहुत ही नेक काम है लेकिन उसका प्रचार करना बहुत ही गलत। अब ये समझ नहीं आ रहा कि ये जनाब गरीब बच्चों का पेट भर रहे हैं या अपना प्रचार कर रहे हैं)

इन सभी बातों को सोंचने और इसका हल ढूंढने की बजाय कुछ लोग किसी गरीब बच्चे को Pizza परोस देते हैं और उसके साथ फुटपाथ पर Selfie लेकर अपने Timeline पर पोस्ट करते हैं। आम लोगों की तो गलती है ही लेकिन सरकार भी 'बचपन' को सिर्फ कागजों पर ही बढ़ावा देती है। हकीकत के मायने में जितना बोला जाता है उसका 10 फीसदी काम भी जमीनी स्तर पर नहीं होता। आईए आपको बताते हैं देश में मौजूद ऐसे बच्चों की समस्या के बारे में जिसे सरकार के साथ-साथ हमें और आपको भी खत्म करने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी।

करके देखिए अच्छा लगेगा

-किसी एक गरीब बच्चे का स्कूल में Admission कराइए ज्यादा नहीं उसे 10वीं तक पढ़ाइए आगे का रास्ता वह खुद बना लेगा और आपको अपने सगे बेटे से ज्यादा चाहेगा और आपको भगवान की तरह ही पूजेगा।
-अपने क्षेत्र के सरकारी स्कूल में अक्सर जाइए। वहां समय निकालकर बच्चों को पढ़ाइए। इससे न सिर्फ आपको उस स्कूल में तैनात शिक्षकों के पढ़ाने के तौर-तरीकों के बारे में पता चलेगा बल्कि बच्चों की कमजोरियों का भी पता चलेगा।

-अगर आपको लगता है कि शिक्षक बच्चों को उचित शिक्षा नहीं दे रहे हैं तो उसकी शिकायत शीर्ष शिक्षा अधिकारी को दें। निश्चित तौर पर उस स्कूल के शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई होगी और आगे जो भी शिक्षक आएंगे वह बिल्कुल लापरवाही नहीं करेंगे।
-एक जिम्मेदार नागरिक होने का फर्ज निभाइए। सरकारी स्कूलों में होने वाले कार्यक्रमों में जाकर अपनी उपस्थिति भी दर्ज कराइए। आरकेस्ट्रा और बार-बालाओं पर पैसे उड़ाने की बजाए किसी बच्चे को निबंध प्रतियोगिता, बाल सभा में अच्छे विचार प्रकट करने, खेल-कूद में अव्वल आने पर प्रोत्साहन राशि देकर सम्मानित करें।
-अगर स्कूल में 5वीं, 8वीं, 12वीं कक्षा अंतिम हैं तो वहां जाकर परीक्षा परिणाम घोषित होने से पहले इस बात की घोषणा कीजिए कि आप या आपके साथी ऐसे बच्चों को आगे पढ़ाने में मदद करना चाहते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर हो और पढ़ने में अच्छा। यकीन मानिएं आपके इस कदम से न सिर्फ उस बच्चे को आगे की शिक्षा मिलेगी बल्कि वह पूरी जिंदगी आपको ईश्वर से ज्यादा चाहेगा।
-अगर आप ग्रामीण क्षेत्र के नागरिक हैं और आपकी भी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और आप कुछ बच्चों को शिक्षा दिलाने में उनकी मदद करना चाहते हैं तो भी आप बड़े आसानी से यह काम कर सकते हैं। कुछ ऐसे बच्चों को साथ लेकर क्षेत्र में जाएं और लोगों से सहयोग राशि की मांग करें। ऐसे मामलों में जो भी मनुष्य (दिल से मनुष्य होगा) वह आपकी मदद करेगा।

शिक्षा का अधिकार सिर्फ कागजों पर, सबसे ज्यादा गलती हमारी!


शिक्षा का अधिकार (Right to Education) बस नाम मात्र का है। निजी स्कूलों में तो गरीब बच्चों के Admission भी नहीं हो पाते और सरकारी स्कूल तो 'राम भरोसे' ही चल रहे हैं। यहां कोई देखने वाला नहीं है कि शिक्षक ने बच्चों को क्या पढ़ाया? शिक्षक स्कूल समय पर आते हैं या नहीं? वह क्या पढ़ाते हैं? बस हम आप सरकारी व्यवस्था के खिलाफ एक-दो स्थानों पर लंबी चौड़ी हांककर चलते बनते हैं और उसमें कुछ लोग आपकी 'हां' में 'हां' भी मिलाते हैं। अब यहां पर आपसे ही सवाल है कि आपने बच्चों की शिक्षा के लिए क्या किया? सरकारी स्कूलों में अगर शिक्षक नहीं पढ़ा रहे हैं तो उनकी शिकायत आपने क्यों शीर्ष अधिकारी से नहीं की? क्या यह आपका दायित्व नही है? शायद है! अगर नहीं है तो आप अपने बच्चे को निजी स्कूल में पढ़ा रहे हैं जहां उसे अच्छी शिक्षा मिल रही है। गरीब के बच्चों से आपको क्या मतलब है।


आप पर मां लक्ष्मी की कृपा है...आप अपने बच्चों के निजी स्कूल में पढ़ा रहे हैं... बहुत ही अच्छी बात है। लाखों रुपए डोनेशन आप अपने बच्चों के Admission के लिए निजी स्कूलों को दे देते हैं लेकिन क्या किसी गरीब बच्चे का Admission आपने सरकारी स्कूल में कराया? शायद नहीं! क्या किसी आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे को उसे पढ़ने के लिए किताबें खरीदकर दीं? शायद नहीं! क्या आपने एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले ऐसे बच्चे को स्कूल ड्रेस बनाकर दी जो उसे बनवा पाने में सक्षम न हो? शायद नहीं! लेकिन जब बात लंबी-लंबी बोलने की आ जाए तो पूरी सरकार को आप ही शिक्षा को लेकर कटघरे में खड़े कर देते हो। एक बार किसी गरीब बच्चे के लिए शिक्षा का सूत्रधार आप बनकर देखिए सच में आपको बहुत मजा आएगा।


आपके क्षेत्र में यदि कहीं आरकेस्ट्रा आदि का आयोजन किया जाता है तो आप वहां पहुंच जाते हैं। उसके बाद बार-बालाओं पर 1000-1000 के नोट उड़ाने में अपनी बहादुरी और अपने आपको धनवान बताने की कोशिश करते हैं। क्या आपने सोचा है कि यदि उन्हीं नोटों को किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई पर उड़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलेगा? शायद नहीं! आप उन नोटों को गरीब बच्चों की शिक्षा पर उड़ाकर देखिया ऐसा फल मिलेगा जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

बच्चों के प्रति अपराध:

वैसे तो बच्चों के प्रति किसी भी प्रकार के अपराध का होना एक चिंता का विषय है किन्तु बच्चों के यौन शोषण सम्बन्धी अपराधों का बढ़ना विशेष चिंता का विषय है। बच्चों का यौन शोषण केवल अपराध ही नहीं उनके प्रति क्रूरता भी है। National Crime Records Beuro (NCRB) के द्वारा जारी किए गए रिपोर्ट के मुताबिक 2013 की तुलना में वर्ष 2014 में बच्चों के प्रति विभिन्न प्रकार के अपराधों में लगभग 50 प्रतिशत की बृद्धि हुयी है। वर्ष 2013 में जहां रिपोर्टेड अपराधों की संख्या 58224 रही थी वही 2014 में यह संख्या बढ़ कर 89423 हो गयी है। इसी तरह यह आकड़ां 2015-2016 में भी बढ़ा।

NCRB के आकड़ों के मुताबिक, इनमें से यौन शोषण (Rape and sexual assault) के मामलों की संख्या मामलों की कुल संख्या का लगभग 21.41 प्रतिशत दोनों वर्षों में रही है। यौन अपराधों के बढ़ने की दर 2012 की अपेक्षा 2013 में लगभग 45% और 2013 की अपेक्षा 2014 में लगभग 55 % रही है। हम सभी जानते हैं कि अनेक कारणों से अपराधों के सभी मामले रिपोर्ट नहीं हो पाते हैं। वास्तविक आंकड़े इनसे कहीं अधिक होंगे। यानि साफ है जो मामला पुलिस ने दर्ज किया NCRB के पास वही आकड़े रहते हैं। 

'मजबूरी' की मजदूरी तले दबा बचपन

बचपन...!, इंसान की जिंदगी का सबसे हसीन पल, न किसी बात की चिंता और न ही कोई जिम्मेदारी। बस हर समय अपनी मस्तियों में खोए रहना, खेलना-कूदना और पढ़ना लेकिन सभी का बचपन ऐसा हो यह जरूरी नहीं। 'बाल मजदूरी' यह भी देश के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप है। बाल मजदूरी के प्रति सरकार कड़े कदम उठा रही है.. ऐसे करने अथवा करवाने वाले को सरकार और न्यायलय कड़ा दंड दे रही है लेकिन एक हकीकत यह भी है कि अगर वह बच्चे मजदूरी नहीं करेंगे तो खाएंगे क्या? उनका बचपन तो 'मजबूरी' की मजदूरी के नीचे दबा हुआ है। आखिर कौन सा बच्चा खुद को खासकर बचपन में मजदूर के रूप में चाहेगा।


गरीबी, लाचारी और माता-पिता की प्रताड़ना के चलते ये बच्चे बाल मजदूरी के इस दलदल में धंसते चले जाते हैं। आज दुनिया भर में 215 मिलियन ऐसे बच्चे हैं जिनकी उम्र 14 वर्ष से कम है और इन बच्चों का समय स्कूल में कॉपी-किताबों और दोस्तों के बीच नहीं बल्कि होटलों, घरों, उद्योगों में बर्तनों, झाड़ू-पोंछे और औजारों के बीच बीतता है।  

आपको बड़े शहरों के साथ-साथ छोटे शहरों में भी हर गली नुक्कड़ पर कई राजू-मुन्नी-छोटू-काली, मिल जाएंगे जो 'मजबूरी' में मजदूरी कर रहे हैं और यह बात सिर्फ बाल मजदूरी तक ही सीमि‍त नहीं है इसके साथ ही बच्चों को कई घिनौने कुकृत्यों का भी सामना करना पड़ता है। जिनका बच्चों के मासूम मन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है।

ऐसा नहीं है सरकार इनकी मदद नहीं करती। आज सरकार ने आठवीं तक की शिक्षा को अनिवार्य और निशुल्क कर दिया है, लेकिन लोगों की गरीबी और बेबसी के आगे यह योजना भी निष्फल साबित होती दिखाई दे रही है। बच्चों के माता-पिता सिर्फ इस वजह से उन्हें स्कूल नहीं भेजते क्योंकि उनके स्कूल जाने से परिवार की आमदनी कम हो जाएगी। माना जा रहा है कि आज भारत में 60 मिलियन बच्चे बाल मजदूरी के शिकार हैं। आंकड़ों की यह भयावहता हमारे देश और समाज के लिए भविष्य में कलंक बन सकत है।


भारत में बाल मजदूरों की इतनी अधिक संख्या होने का मुख्य कारण सिर्फ और सिर्फ गरीबी है। यहां एक तरफ तो ऐसे बच्चों का समूह है बड़े-बड़े मंहगे होटलों में 56 भोग का आनंद उठाता है और दूसरी तरफ ऐसे बच्चों का समूह है जो गरीब हैं, अनाथ हैं, जिन्हें पेटभर खाना भी नसीब नहीं होता। दूसरों की जूठनों के सहारे वे अपना जीवनयापन करते हैं।   


इन गरीब बच्चों पर उस समय और आफत आन पड़ती है जब ये दो वक्त की रोटी कमाना चाहते हैं और इन्हें बाल मजदूर का हवाला देकर कई जगह काम ही नहीं दिया जाता। आखिर ये बच्चे क्या करें? कहां जाएं ताकि इनकी समस्या का समाधान हो सके? सरकार ने बाल मजदूरी के खिलाफ कानून तो बना दिए। इसे एक अपराध भी घोषि‍त कर दिया लेकिन क्या इन बच्चों की कभी गंभीरता से सुध ली?   


अब कई सवाल उठते हैं क्या आपको नहीं लगता कि कोमल बचपन को इस तरह गर्त में जाने से आप रोक सकते हैं? देश के सुरक्षित भविष्य के लिए वक्त आ गया है कि आपको यह जिम्मेदारी अब लेनी ही होगी। क्या आप लेंगे ऐसे किसी एक मासूम की की जिम्मेदारी? 

अनाथ बच्चों का बुरा हाल, समाज ही डांटकर भगाता है

स्ट्रीट चिल्ड्रेन...! एक ऐसा शब्द है, जो शहर की सड़कों पर रहने वाले बच्चों के लिए प्रयोग होता है। ये वह बच्चे होते हैं जो अपने माता-पिता को खो चुके होते हैं। इन्हें समाज ने 'अनाथ' भी नाम दिया है। इनमें ज्यादातर बच्चे 5 से 17 वर्ष के हैं और अलग-अलग शहरों में उनकी जनसंख्या भिन्न है। स्ट्रीट चिल्ड्रेन निर्जन भवनों, गत्तों के बक्सों, पार्कों अथवा सड़कों पर रहते हैं।

स्ट्रीट चिल्ड्रेन... को परिभाषित करने के लिए काफी कुछ लिखा जा चुका है, पर बड़ी कठिनाई यह है कि उनका कोई ठीक-ठीक वर्ग नहीं है, बल्कि उनमें से कुछ जहां थोड़े समय सड़कों पर बिताते हैं और बुरे चरित्र वाले वयस्कों के साथ सोते हैं। वहीं कुछ ऐसे हैं, जो सारा समय सड़कों पर ही बिताते हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता।

भारत का इस मामले में बहुत बुरा हाल है। एक अरब से ज्यादा आबादी वाला भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है जिसमें बच्चों की आबादी 40 करोड़ के करीब है। मानवाधिकार संगठन के अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 1 करोड़ 80 बच्चे सड़कों पर रहते या काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे अपराधों, यौनवृत्तियों, सामूहिक हिंसा तथा नशीले पदार्थों के शिकार हैं।

कुपोषण से प्रतिवर्ष मरते हैं 10 लाख बच्चे!

भारत में 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चे हर साल कुपोषण के कारण मर जाते हैं। इतना ही नहीं कुपोषण के मामले में भारत दक्षिण एशिया का अग्रणी देश बन गया है जहां कुपोषण के मामले सबसे अधिक पाए जाते हैं।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुपोषण के कारण प्रत्येक वर्ष 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। 

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