ढ़ाई आखर का वो अनपढ़ कवि जिस पर आज ज्ञानी PHD कर रहे हैं

New Delhi : 15वीं सदी में जन्में कबीर और आज 21वीं सदी चल रही है यानी 600 साल पहले की बात है जब कबीर का जन्म बनारस में हुआ। जुलाहे माता पिता ने नन्हें कबीर को पाला-पोसा। गरीबी उन्होंने शुरू से देखी थी लेकिन कभी गरीब नहीं बने, गरीबी को मन पर हावी नहीं होने दिया जब तक जीये राजा की तरह जीये। अगर कोई व्यक्ति उनके जन्म की परिस्थितियों में उलझ जाएगा तो कबीर क्या थे तनिक भी न समझ पाएगा। आज बड़े बड़े विचारकों को हैरानी होती है कि एक साधारण से परिवार में जन्में कबीर जिनका जीवन घोर गरीबी में बीता वो गरीबी और उत्पीड़न पर विचार विमर्श की बजाए ढ़ाई आखर प्रेम का लिखते हैं। हालांकि उन्होंने अन्याय, उत्पीड़न, रूढ़ीवादी आडंबरों पर भी लिखा है लेकिन कबीर का इन विषयों पर लिखना भी लोगों को प्रेम के मार्ग पर प्रशस्त करना था। कबीर का पूरा लेखन जानने और जागने का लेखन है। इसी जागने के लिए कबीर लोगों से आग्रह करते हैं।
सुखिया सब संसार है खावै और सोवै
दुखिया दास कबीर है जागे और रोवै
कबीर जिस जागने की बात कर रहे हैं वो क्या है। ये जागना दुनिया को खुली आंखों से देखना है, अपने आस-पास जो गलत हो रहा है जिससे व्यक्ति की आत्मा को दुख पहुंच रहा है उसे जानना है उस पर सवाल करना है उसका हल ढूंढ़ना है। लेकिन जिस समय में कबीर पैदा हुए उसमें सवाल करना बड़ी आफत की बात हो जाती थी लेकिन इसकी चिंता छोड़ कबीर ने बेबाकी से गलत को गलत और सही को सही कहा। उनके इसी अंदाज से पंडितों, मौलवियों और बड़े-बड़े पुरोहितों की नींद हराम हो गई। जब कबीर ने जाति के खिलाफ, मूर्ती पूजा के खिलाफ धर्म के नाम पर फैलाई जा रही रूढ़ियों और आडंबरों के खिलाफ बोला तो इन सभी ने कबीर का जमकर विरोध किया। कबीर ने गालियां झेलीं आलोचनाएँ सहीं लेकिन सवाल करते रहे लोगों को समाज को जगाते रहे। लेकिन जो लोग सबकुछ सहकर भी रोज के काम काज में उलझे रहते हैं और किसी पर कोई सवाल नहीं करते उनके लिए इस संसार में कोई दुख नहीं। लेकिन कबीर इस समाज को एक रास्ता दिखाना चाहते थे जिसपर चलकर सभी आनंदित हो सकें। इसके लिए वो जागते थे और सवाल करते थे।
साधो, देखो जग बौराना।
साँची कही तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना
हिन्दू कहत,राम हमारा, मुसलमान रहमाना 
आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना 
बहुत मिले मोहि नेमी, धर्मी, प्रात करे असनाना 
आतम-छाँड़ि पषानै पूजै, तिनका थोथा ज्ञाना 
आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना
पीपर-पाथर पूजन लागे, तीरथ-बरत भुलाना 

“अरे इन दोहुन राह न पाई।
हिन्दू अपनी करे बड़ाई गागर छूवन न देई।
बेस्या के पायन-तर सोवै यह देखो हिंदुआई।
मुसलमान के पीर-औलिया मुर्गी-मुर्गा खाई।
खाला केरी बेटी ब्याहै घरहिं में करै सगाई।
हिंदुन की हिंदुवाई देखी तुरकन की तुरकाई।”

कबीर ऐसे व्यक्ति हैं कि उन्हें हिंदु भी मानते हैं और मुसलमान भी लेकिन कबीर दूसरा पक्ष ऐसा नहीं है उन्होंने जो कहा जिस मार्ग को उजागर किया उसे अपनाने के लिए न तो हिंदू राजी होता है और न ही मुसलमान। लेकिन कबीर के लिए लड़ना सभी को है उनके इसी विरले अंदाज के कारण उनसे हिंदू भी किनारा करते हैं और मुसलमान भी। कबीर तो सिर्फ गलत को गलत और सही को सही कहने वाले साधु थे जिसने माना तो ठीक न माना तो वो भी ठीक।
मुसलमान कबीर को अपना मानता हैं लेकिन जब देखते हैं कि कबीर की कविताओं में उनकी कही बातों में उनकी भक्ति में राम शब्द जब तब चला आता है तो उससे किनारा कर लेते हैं ऐसा ही हाल हिंदुओं का भी है जब कबीर कहते हैं “पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़ इससे तो चाकी भली पीस खाए संसार” इस पर ही बात बिगड़ जाती है। कबीर को अपना कहना आसान नहीं है उनके लिए तो बिल्कुल नहीं जो पंडित ज्ञानी और समझदार हैं। इस अनपढ़ विरले कवि को समझने के लिए सारी चालाकियां, चतुराइयां, प्रलोभन सभी को एक तरफ रखना होगा और ढ़ाई अक्षर के शब्द प्रेम से नाता जोड़ना होगा। कबीर विरले और विरोधाभासी सिर्फ इसीलिए नजर आते हैं क्योंकि दुनियां उन्हें विचारों से तोलती है जबकि कबीर समाज को विचार को पा लेने के बाद उससे पार पाने तक के रास्ते पर ले जाते हैं। लोग सोचते हैं कबीर भगवान का विरोध करते हैं और फिर उसके पाने का भी मार्ग सुझाते हैं, वो सोचते हैं कबीर तर्क की बात कर दुनिया को जगाना चाहते हैं और फिर मुक्ति और मोक्ष की भी बात करते हैं। दरअसल कबीर खुद को जानने पर जोर देते हैं मन को टटोलने और उसकी चंचलता से पार पाने पर जोर देते हैं और ये तभी संभव है जब व्यक्ति सांसारिक दुखों, समस्याओं से मुक्त हो जाएं। कबीर इश्क पर जोर देते हैं इसलिए वे उन्हें विरोधाभासी लगते हैं जो मन की चालाकी चतुराई से बाहर नहीं निकल पाते और प्रेम को नहीं जान पाते।
“हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?”
“संसारी से प्रीतड़ी, सरै न एको काम |
दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम ||”
कबीर का स्टाईल सब विचारकों दार्शनिकों कवियों और महात्माओं सबसे अलग और अनूठा है। उनका स्टाईल मीठी मीठी बातें करने का नहीं है उनकी बातें तभी मीठी लगेंगी जब व्यक्ति खुद को जान लेगा जब चतुराई, लालच, अन्याय को त्याग देगा। नहीं तो कबीर का स्टाईट चाबुक ही नजर आएगा। वो ज्यादा कुछ नहीं कहते उनके पास कहने के लिए सिर्फ थोड़े से ही शब्द होते हैं जिन्हें वो दो लाइन में कह देते हैं। लेकिन वो इन्हीं थोड़े से शब्दों को इस तरह कहते हैं कि व्यक्ति को गिरेबान से पकड़ कर झिंझोड़ देते हैं। “कंकड़ पत्थर जोर के मस्जिद लई बनाए ता पे मुल्ला बांग दे क्या बेहरा हुआ खुदाय” ये कहने की हिम्मत आज भी कई लोग नहीं कर पाते लेकिन कबीर उस समय ये कह रहे थे जब लोगों को सूली पर चढ़ा दिया जाता था। ये उनका स्टाईल ही था जो वो कह देते हैं –
“मैं कहता हौं आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखी ।
मैं कहता सुरझावन हारी, तू राख्यो अरुझाई रे ॥
मैं कहता तू जागत रहियो, तू जाता है सोई रे ।
मैं कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे ॥”
ये सब कबीर उस ब्राह्मण से उस समय कह रहे है जब पूरे समाज में उसका दबदबा देखा जाता था। लेकिन कबीर इसे कहते बिल्कुल नहीं हिचकते वो अपने स्टाईल पर कायम रहते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण इस दोहे में देखीये-
माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रौंदे मोय
इक दिन ऐसा आएगा मैं रौदुंगी तोहे
“कबिरा खड़ा बाजार में लिये लुकाठी हाथ
घर फूंके जो आपना चले हमारे साथ” इस दोहे में कबीर का स्टाईल अलग ही दिख रहा है। कबीर घर-बार में आग लगाने की बात कर रहे हैं। कबीर कह रहे हैं हमारे साथ-संगत में तभी आइये जब आप अपने मन के पार जाने के लिए तैयार हों, जब सभी वासनाओं से मु्क्त हो जाना चाहते हों, संसार को जान कर उसकी चाह से मुक्त हो जाना चाहते हों।
कबीर के राम वो राम नहीं हैं जो दशरथ के पुत्र हैं और जिनका जन्म अयोध्या में हुआ। कबीर के राम वो राम हैं जो न कभी जन्में न कभी उनकी मृत्यु हुई वो तो सर्वविदित हैं उनकी छवि हर कहीं हैं। कबीर के राम करुणा, दया, कृपा, उदारता जैसे महान गुणों के स्वामी हैं। आकार रहित होने के बावजूद कबीर के राम संसार की सभी शक्तियों से परिपूर्ण एवं उनको अपने वश में करने वाले हैं। कबीर के राम सर्वव्यापी, अखिल विश्व के स्वामी एवं सभी के हृदय में सदैव विद्यमान रहने वाले हैं। कबीर के राम का कोई आकार नहीं है इसलिए उसकी शक्ति-सामर्थ्य एवं अगोचर दिव्य सत्ता को हम केवल महसूस कर सकते हैं उसे व्यक्त करना सबके बस की बात नहीं है।
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥
“जो सुख पाऊँ राम भजन में
सो सुख नाहिं अमीरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥
भला बुरा सब का सुनलीजै
कर गुजरान गरीबी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥”
“मोको कहां ढूढें तू बंदे मैं तो तेरे पास मे ।
ना मै देवल ना मै मसजिद ना काबे कैलाश मे ।
ना तो कोनी क्रिया-कर्म मे नही जोग-बैराग मे ॥
खोजी होय तुरंतै मिलिहौं पल भर की तलास मे
मै तो रहौं सहर के बाहर मेरी पुरी मवास मे
कहै कबीर सुनो भाई साधो सब सांसो की सांस मे ॥”
कबीर का सारा चिंतन सारा लेखन मन के लिए है। कबीर ऐसे पहले कवि हुए हैं जिन्होंने सबसे पहले मन को कविता का विषय बनाया। मन के अलावा उन्होंने किसी पर कुछ नहीं लिखा जो भी लिखा घूम फिर कर मन पर केंद्रित हो जाता है।
मन के हारे हार है मन के जीते जीत
ये मन मिलावे राम से और मन ही करे फजीत
कबीर मन के पार जाने पर जोर देते थे इस निर्मल बनाकर इसमें प्रेम परमात्मा की मूरत स्थापित करने की बात कहते थे।
“मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक |
जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक ||
मनुवा तो पंछी भया, उड़ि के चला अकास |
ऊपर ही ते गिरि पड़ा, मन माया के पास ||”
“माला फेरत जुग भया गया न मन का फेर
कर का मनका डारि दे मन का मनका फेर”
कबीर मन की माला की बात कर रहे हैं जबकि हाथ में जो माला है उसे फेंकने की बात कर रहे हैं। कबीर मन को निर्मल बनाने के लिए मन का मनका फेरने की बात करते हैं। जिससे मन के भी पार जाया जा सके।

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