वो डॉक्टर, जिसने इंदिरा गांधी को सुनाई थी खरी-खोटी, दिन में 18-18 घंटे करती थीं गरीबों का इलाज

वो डॉक्टर, जिसने इंदिरा गांधी को सुनाई थी खरी-खोटी, दिन में 18-18 घंटे करती थीं गरीबों का इलाज

By: Aryan Paul
September 06, 18:09
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New Delhi:

देश के इतिहास की वो लेडी डॉक्टर, जिसने नसबंदी के लिए इंदिरा गांधी को खरी-खोटी सुनाई और बापू की एक झलक पाते ही खुशी से चहक उठीं, जिसने बापू के हरिजन फंड में भी योगदान दिया, वो लेडी डॉक्टर जो 18 घंटे गरीब महिलाओं का इलाज करने में बिता देती थी और साथ ही राष्ट्रवाद की प्रबल समर्थक थी। जी हां हम बात कर रहे हैं 7 सितंबर 1917 को पारसी परिवार में जन्मी मां-बाप की इकलौती संतान डॉक्टर बानो कपाडिया की। जो जहांगीर कोयाजी से शादी के बाद बानो जहांगीर कोयाजी के नाम से फेमस हुई। बानो की भी एक ही संतान थी। 

बता दें कि बानो के पिता पेस्टनजी कपाडिया एक सिविल इन्जीनियर और आर्कियोलॉजिस्ट थे। पढ़ाई के लिए उनके माता-पिता ने उन्हें उनके ननिहाल भेज दिया, जो पुणे में था। क्योंकि उन्हें यह डर था कि इकलौती सन्तान होने के कारण मुम्बई में बानो ठीक से पढ़ नहीं पाएंगी। पुणे में बानो की पढ़ाई कान्वेन्ट ऑफ जीसस मेरी में हुई। कान्वेन्ट में पढ़ते हुए बानो ने म्यूजिक सीखा। म्यूजिक बानो को पिता से विरासत में मिला था। राष्ट्रवादी होने के बावजूद जब 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आए तब उनके पिता ने उनके सम्मान में एक गाना गाकर उन्हें सुनाया था। बानो ने 1933 में मुंबई के सेन्ट जेवियर्स कालेज में प्री-मेडिकल में एडमिशन लिया। उनकी मेडिकल डिग्री भी मुंबई में ग्रान्ट मेडिकल कॉलेज से पूरी हुई। 1940 में उन्होंने M.D की डिग्री भी वहीं से हासिल की।

1943 में बानो तथा उनके पति जहांगीर ने अपना घर पुणे में बना लिया और उनका परिवार वहां आ गया| जहांगीर का काम भी पुणे इलेक्ट्रिक सप्लाई कम्पनी में था। पुणे जाकर बानो ने स्त्री रोग तथा प्रसूति में अपनी प्रेक्टिस करने की बजाय डॉ. इडुल्जी कोयाजी के साथ बतौर सामान्य डॉक्टर काम करना शुरू किया। एक दिन उन्हें उनके पति जहांगीर ने सुझाया कि वह अगले दिन से ही किंग एंडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल (KEM) में काम करना शुरू करें। पूछने पर पता चला कि उस अस्पताल के चेयरमैन सरदार मुदलियार ने खुद बानो को बलाया है। उन्हें एक कुशल डाक्टर की तत्काल जरूरत है। इस सजेशन को मानकर 14 मई 1944 से बानो KEM में बतौर डॉक्टर काम करने लगीं। बता दें कि KEM अस्पताल 1912 में पुणे के एक फेमस शख्स की याद में शुरू किया गया था, जिनकी मृत्यु उसी साल हुई थी। पहले यह एक बहुत ही छोटा सा प्राइवेट अस्पताल था और उस समय इसमे सिर्फ 40 बेड ही थे, लेकिन बानो ने अपनी मेहनत से अस्पताल को काफी आगे बढ़ाया ।

बता दें कि KEM अस्पताल तब सिर्फ गर्भवती महिलाओं के इलाज के लिए ही था, लेकिन वहां पर सभी तरह की बीमार महिलाएं आने लगीं। उनमें ज्यादातर गरीब परिवार की ही महिलाएं आती थी, वो भी जब बहुत ज्यादा बीमार हो जाती थीं। इसलिए अक्सर उनका इलाज करते-करते बानो कभी-कभी 18 घंटे तक अस्पताल में रुक जाती थीं। बानो को बचपन से ही राष्ट्रीय भावना के संस्कार मिले थे। उनका लगाव गांधी जी के प्रति भी था। एक बार छुट्टियों में वह बलसार के समुद्र तट से लगे एक परिवार के घर में थीं तभी बानो ने और उनकी ममेरी बहनों ने गांधी जी को सागर तट पर टहलते हुए देखा। उस समय बानो बच्ची ही थीं। उस दौर में गांधी जी हरिजनों के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे थे। गांधी जी को देख कर बानो तथा उसकी बहनें भाग कर उनके पास गईं। गांधी जी ने पूछा- तुम लोग कहीं से आई हो, इन्होंने इशारा करके अपना घर दिखाया। तब गांधी जी ने कहा कि तब तो तुम लोग बड़े अमीर हो और उनसे हरिजन फंड के लिए 100-100 रुपये लेकर आने को कहा। बानो दौड़ती हुई गईं और गांधी जो को चंदा लाकर दिया ।

बानो परिवार नियोजन कार्यक्रम की जरूरत को गहराई से समझती थीं और बानो परिवार नियोजन की पक्षधर भी थीं, लेकिन उन्होंने इमरजेंसी में इंदिरा गांधी के इसे चलाए जाने के तरीके की आलोचना की और इन्दिरा गांधी के सामने अपनी बात रखी। 1989 में बानो को पद्‌मभूषण की उपाधि से नवाजा गया। 1993 में जनसेवा के लिए रमन मैगसेसे पुरस्कार भी मिला। 15 जुलाई 2004 को बानो जहांगीर कोयाजी स्वर्ग सिधार गईं।

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