इस राइटर ने बच्चों को बना दिया साहित्य का दीवाना, लिखी 300 से ज्यादा किताबें

इस राइटर ने बच्चों को बना दिया साहित्य का दीवाना, लिखी 300 से ज्यादा किताबें

By: Aryan Paul
November 13, 18:11
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New Delhi: 

हरिकृष्‍ण देवसरे को हिन्‍दी का फेमस बाल साहित्‍यकार और संपादक माना जाता है। कविता, कहानी, नाटक, आलोचना आदि चीजों में उनकी लगभग 300 से ज्यादा किताबें पब्लिश हुई हैं। वे बच्‍चों की लोकप्रिय पत्रिका पराग के 10 साल तक संपादक भी रहे। देवसरे का जन्म मध्य प्रदेश के सतना जिले के नागौद में हुआ। बच्चों के लिए लिखे गए उनके साहित्य को सबसे ज्यादा पसंद किया गया। उनके बारे में कहा जाता है कि देवसरे देश के पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने बाल साहित्य में डाक्टरेट की उपाधि हासिल की थी । देवसरे जी जितने अच्छे लेखक थे उतने ही ही अच्छे संपादक भी थे। पराग पत्रिका में उन्होंने आधुनिक बच्चों की समस्याओं पर ध्यान दिया। उन्होंने भूत-प्रेतों या पारम्परिक जादू की कहानियों को जगह नहीं दी। उन्होंने कविताओं और शिशु गीतों में भी बहुत प्रयोग किए।


बच्चों के लिए लेखन के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पुरस्कार भी दिया गया। 2011 में उन्हें साहित्य अकादमी बाल साहित्य लाइफटाइम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के द्वारा उन्हें बाल साहित्य सम्मान, कीर्ति सम्मान और हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान समेत कई पुरस्कार दिए गए। उन्होंने अपने जीवन में 300 से ज्यादा किताबें लिखीं। देवसरे अपने लेखन में राजा-रानी और परियों के होने के ऊपर सवाल खड़ा करते थे। उन्होंने भारतीय भाषाओं में लिखे गए बाल-साहित्य में रचनात्मकता पर बल दिया और बच्चों के लिए मौजूद विज्ञान-कथाओं और ख़ालीपन को भरने की कोशिश की। डॉक्टर हरिकृष्ण देवसरे क़रीब 22 साल तक आकाशवाणी से जुड़े रहे और वहां से रिटायर्ड होने के बाद बच्चों की पराग पत्रिका का संपादन करने लगे थे। 


डॉक्टर हरिकृष्ण देवसरे ने धारावाहिकों, टेलीफिल्मों और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर आधारित कार्यक्रमों के लिए कहानियां भी लिखी। डॉक्टर हरिकृष्ण देवसरे ने कई किताबों का अनुवाद किया। डॉक्टर हरिकृष्ण देवसरे ने 1960 में कार्यक्रम अधिशासी के रूप में आकाशवाणी से अपना करियर शुरू किया और 1984 तक विभिन्न विषयों पर महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का निर्माण और प्रसारण किया । देवसरे ने साल 2007 में न्यूयॉर्क में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में भी भाग लिया था। उनके बारे में साहित्य अकादमी बाल पुरस्कार विजेता रमेश तैलंग का कहना है कि बाल साहित्य आलोचना का काम किसी ने भी नहीं किया। देवसरे जी संभवत पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने इस क्षेत्र में क्रमबद्ध आलोचना का बहुत ही बढ़िया काम किया है। उनमें एक वैज्ञानिक सोच थी जो आधुनिकता और परम्परा में बहुत अच्छा समन्वय करती थी। इसलिए देवसरे जी का व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही उन्हें आकर्षित करता है।


डॉ. देवसरे ने बालसाहित्‍य की लगभग हर विधा पर लिखा है और हर क्षेत्र में अपनी विचारधारा की छाप छोड़ी है। उनकी छवि बनी एक वैज्ञानिक सोच वाले इंसान की थी। बालसाहित्‍य के नाम पर परीकथाओं और जादू-टोने से भरी रचनाओं के विरोधी बालसाहित्‍यकार की उनकी छवि बनी। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि वे बालसाहित्‍य की पुरातन परंपरा को पूरी तरह नकारते हों, पर परी कथाओं की मोहक कल्‍पनाशीलता से उन्‍हें जरा-भी ना मोहया। देवसरे परंपरा के नाम पर भूत-प्रेत, जादू-टोने, तिलिस्‍म जैसी अतार्किक स्‍थापनाओं, इनके आधार पर गढ़ी गई रचनाओं का शुरू से ही विरोध करते थे। 

कुल मिलाकर वे चाहते थे कि बच्‍चों को भाग्‍य के भरोसे ना जीना सिखाए जाए। चमत्‍कारों में उनकी आस्‍था पैदा ना की जाए, बल्कि उन्हें सच से रूबरू कराया जाए। जीवन-संघर्ष में पलायन की शिक्षा दिया जाए। उनके लिए गिल्‍बर्ट कीथ चेटरसन ने कहा था कि- परीकथाओं में व्‍यक्‍त कल्‍पनाशीलता सत्‍य से भी बढ़कर हैं, इसलिए नहीं कि वह हमें सिखाती हैं कि राक्षस को खदेड़ना संभव है, बल्‍कि इसलिए कि वे हमें एहसास दिलाती हैं कि दैत्‍य को दबोचा भी जा सकता है। जहां भी उन्हें अवसर मिलता, वे बालसाहित्‍य में नई परंपरा की खोज करने लगते। उन्होंने 50 से अधिक सालों तक मौलिक लेखन, कई दर्जन पुस्‍तकें, उत्‍कृष्‍ट पत्रकारिता, संपादन, समालोचना और अनुवाद करना जारी रखा। कुल मिलाकर बालसाहित्‍य के नाम पर अपने आप में एक संस्‍था, एक शैली, एक आंदोलन वे खुद ही थे।


उनकी लिखकी फेमस कविता-कहानियां हैं- 1968 में उन्होंने खेल बच्चे का कहानी लिखी। 1969 में आओ चंदा के देश चले उसी साल एक और मंगलग्रह में राजू लिखी, जिसे आज भी बड़े चाव से पढ़ा जाता है। फिर 1971 में उड़ती तश्तरियां, स्वान यात्रा, लावेनी, सोहराब रुस्तम, आल्हा ऊदल, गिरना स्काइलैब का, डाकू का बेटा और दूसरे ग्रहों का गुप्तचर आदि लिखा ।

उस जमाने में जब बालसाहित्‍य अपनी कोई पहचान तक नहीं बना पाया था, लोग उसे दोयम दर्जे का साहित्‍य मानते थे। तब ज्यादातर साहित्‍यकार स्‍वयं को बालसाहित्‍यकार कहलवाने से भी परहेज करते थे। और जब बच्‍चों के लिए लिखना हो तो अपना ज्ञान, उपदेश का बखान करने लगते थे। उन दिनों एक बालपत्रिका की संपादकी के लिए जमी-जमाई सरकारी नौकरी न्‍यौछावर कर देना, फिर बच्‍चों की खातिर हमेशा-हमेशा के लिए कलम थाम लेना, ना अंधसमर्पण, और इसके साथ ही जो खुद को अच्छा लगे वो कहना-रचना, लिखते जाना और लिखते ही जाना। बस कुछ ऐसे ही थे, डॉक्टर हरिकृष्ण देवसरे। उनका निधन 14 नवंबर 2013 को लंबी बीमारी के बाद हुआ। अब उनके परिवार में उनकी पत्नी के अलावा दो पुत्र और एक पुत्री है।

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