सरकार का अत्याचार :  3 दिन और 3 रात चलते रहे बुलडोजर, न ठिकाना रहा न रोटी बची

सरकार का अत्याचार : 3 दिन और 3 रात चलते रहे बुलडोजर, न ठिकाना रहा न रोटी बची

By: Ashok Sharma
August 06, 18:08
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PATNA :

मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इन्दु सरकार’ इमरजेंसी के कलंकित कारनामों पर आधारित है। ये फिल्म पूरी तरह से ऐतिहासिक तथ्यों पर तो आधारित नहीं है लेकिन इसमें कई वास्तविक घटनाओं को समेटने की कोशिश की गयी है। तुर्कमान गेट की घटना उनमें से एक है। यह घटना भारतीय राजनीति का सबसे बर्बर और खूनी चेहरा है। संजय गांधी और इंदिरा गांधी ने जुल्म और अत्याचार की सारी हदें पार कर दी थी। आज लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाली कांग्रेस का ये शर्मनाक सच है।

25 जून 1975 को भारत में इमरजेंसी लगी थी। उस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं लेकिन सत्ता का रिमोट कंट्रोल संजय गांधी के हाथ में था। कांग्रेस के गुवाहाटी सम्मेलन में इंदिरा गांधी ने संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम को मंजूरी दे दी थी। संजय गांधी ने दिल्ली को खूबसूरत बनाने के नाम पर जो किया उसकी लोकतंत्र में कल्पना नहीं की जा सकती। संजय गांधी की परिकल्पना थी कि दिल्ली शहर को स्लम एरिया से मुक्त कर देना है।
दिल्ली के तुर्कमान गेट के पास एक झुग्गी आबाद थी। यहां अधिकतर मुस्लिम समुदाय के बेघर लोग दूसरी जगहों से आ कर बसे थे। कई पीढ़ियों ने इस झुग्गी में जिंदगी गुजार दी थी। इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी ने फैसला किया कि तुर्कमान गेट के पास से इस झुग्गी को हटा देना है। 13 अप्रैल 1976 को इस झुग्गी को हटाने की कोशिश शुरू हुई। नोटिस मिलने के बाद स्थानीय लोगों ने विरोध शुरू कर दिया।

18 अप्रैल 1976 को हजारों पुलिस वाले पूरी तैयारी के साथ बुलजोडर लेकर तुर्कमान गेट पहुंचे। घरों को बुलजोडर से तोड़ा जाना लगा। इसके खिलाफ लोगों में भयंकर गुस्सा फूट पड़ा और वे पुलिस का विरोध करने लगे। पुलिस जुल्म पर उतर आयी और उसने भीड़ पर फायरिंग कर दी। तब यह आरोप लगा था कि कई लोग इस घटना में मारे गये थे। इमरजेंसी में सेंसरशिप की वजह से अखबार लाचार थे। अखबारों को इस घटना की खबर छापने की इजाजत नहीं थी। इस लिए मृतकों की वास्विक संख्या के बारे में कोई प्रमाणिक जानकारी नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता ने अपनी किताब- ‘द संजय स्टोरी’ में अब्दुल मलिक के मारे जाने का जिक्र किया है। इस किताब में जिक्र है कि 19 अप्रैल 1976 को करीब 500 महिलाओं और 200 बच्चों को ट्रकों में लाद कर जंगलों में छोड़ दिया गया था।

उस दिन पुलिस और पब्लिक में जोरदार भिडंत हुई थी। भीड़ की तरफ से रोड़ेबाडी और सोडा वाटर की बोतलें फेंकी गयी तो पुलिस ने भी जमकर लाठियां बरसायीं। पुलिस ने जल्द ही भीड़ को पीछे ढकेल दिया। इसके बाद 16 बुलडोजर 22 अप्रैल तक दिन रात चलते रहे। तीन दिनों में यहां से झुग्गी बस्ती का नामोनिशान मिटा दिया गया। इस घटना में सबसे अधिक मुस्लिम समुदाय के लोग ही प्रभावित हुए थे लेकिन आज कांग्रेस दूसरे लोगों को धर्मनिरपेक्षता की नसीहत दे रही है।
 

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