वो लेखक, जिसके बिना हिन्दी साहित्य अधूरा है, जो जीवनभर गरीबी के खिलाफ लड़ता रहा

वो लेखक, जिसके बिना हिन्दी साहित्य अधूरा है, जो जीवनभर गरीबी के खिलाफ लड़ता रहा

By: Aryan Paul
November 13, 07:11
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New Delhi:

गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नवंबर 1917 को ग्वालियर के श्यौपुर में हुआ। मुक्तिबोध हिन्दी साहित्य के प्रमुख कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानिकार तथा उपन्यासकार थे। उनके पिता माधव मुक्तिबोध उर्दू के काफी अच्छे जानकार थे, और अच्छी उर्दू बोलते थे। वे उज्जैन में इन्स्पेक्टर के पद से रिटायर हुए। मुक्तिबोध की मां बुन्देलखण्ड से थीं। पारिवारिक असहमति और विरोध के बावजूद 1939 में शांता के साथ उन्होंने लव-मैरिज की ।मुक्तिबोध को फेमस प्रगतिशील कवि के रूप में एक अलग ही पहचान मिली है। इसके साथ हिन्दी साहित्य में सबसे ज्यादा चर्चित व्यक्ति भी हैं गजनान माधव। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है।


मुक्तिबोध की शुरूआती पढ़ाई उज्जैन में हुई। उनके पिता पुलिस में इंस्पेक्टर थे, जिसके कारण उनका हमेशा तबादला होता रहता था। इसलिए वे एक जगह ठीक से पढ़ भी नहीं सके और उनकी पढ़ाई में भी काफी परेशानियां होती रहीं। उन्होंने इन्दौर से 1938 में बी.ए पास की । जिसके बाद वे उज्जैन के मॉडर्न स्कूल में टीचिंग करने लगे। दोस्त के साथ रात में बाहर घूमने के कारण उन्होंने बीड़ी पीनी शुरू कर दी। दोस्त के साथ रहकर ही उन्हें बीड़ी पीने का चस्का लगा। 


गजानन के दोस्त भी काफी अच्छे कवि थे। उनके दोस्त वीरेन्द्र कुमार जैन रोमानी कल्पना के कवि थे और प्रभागचन्द्र शर्मा अनन्तर कर्मवीर में सहकारी सम्पादक और उस समय के एक योग्य कवि थे। 1943 में अज्ञेय के सम्पादन में तार-सप्तक का प्रकाशन हुआ। जिसकी शुरुआत ही मुक्तिबोध की कविताओं से होती है। उज्जैन से 1945 में मुक्तिबोध बनारस गये और त्रिलोचन शास्त्री के साथ हंस के सम्पादन में शामिल हुए। वहां पर मुक्तिबोध ने सम्पादन से लेकर डिस्पेचर तक का काम किया। उस समय उनकी सैलरी 60 रुपये थी। हालांकि बनारस उनके लिए लकी नहीं रहा। भारतभूषण अग्रवाल और नेमिचन्द्र जैन ने उन्हें कलकत्ता बुलाया, लेकिन वहां भी कोई बात ना बनती देखकर वे आखिर में 1946-1947 में जबलपुर चले गये। जबलपुर में ही वे हितकारिणी हाई स्कूल में पढ़ाने लगे। जबलुपर में पढ़ाने के कुछ समय बाद वे नागपुर चले गए। हालांकि उस समय तक देश में दंगे शुरू हो गए थे। वहां पर वे दैनिक न्यूज पेपर जय-हिन्द में काम करते थे। इसके अलावा वे नया खून साप्ताहिक पेपर में भी रेगुलर लिखते रहे।

उज्जैन में मुक्तिबोध ने मध्य भारत प्रगतिशील लेखक संघ की नीव डाली। सभाओं में भाग लेने के लिए वह डॉ. रामविलास शर्मा, अमृतराय जैसे जाने-माने साहित्यिक विचारकों को बुलाते थे। उन्होंने 1944 में इन्दौर में फ़ासिस्ट विरोधी लेखक सम्मेलन का आयोजन किया। लेखकों की जिम्मेदारियों पर मुक्तिबोध ने भी एक निबन्ध लिखा था। मुक्तिबोध नवोदित प्रतिभावों का निरन्तर उत्साह बढ़ाते रहते और उन्हें आगे लाते। हरिनारायण व्यास, श्याम परमार, जगदीश वोरा आदि उन के प्रभाव में थे। मुक्तिबोध मज़दूरों से भी मिलते-जुलते रहते थे। 



 

पहली बार उन्हें अज्ञेय द्वारा संपादित तार सप्तक में अपनी कविताओं के लिए जाना गया और वही से वे काफी फेमस हुए। हालांकि सच में यह बेहद अफसोसजनक था कि उनके जीते जी उनकी कविता की कोई किताब नहीं प्रकाशित हो पाई, जबकि वे इतने बड़े कवि थे। उनके जीते जी सिर्फ एक किताब ही छपी। और वो थी एक साहित्यिक की डायरी। इसके बावजूद वे ऐसे रचनाकार साबित हुए, जिन्हें उनके आलोचकों ने भी काफी पसंद किया। 1954 में उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया, जिसके कारण उन्हें राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज में नौकरी मिली। उनकी कुछ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कृतियाँ यहीं लिखी गईं। उनकी कृतियों के नाम इस प्रकार है। उनक लिखी कविताएं हैं- चांद का मुंह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल। इसके अलावा अंधेरे में, एक अंतर्कथा, कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं, ब्रह्मराक्षस, चाहिए मुझे मेरा असंग बबूल पन जैसी अनेक रचनाएं हैं।

मुक्तिबोध की रुचि पढ़ने-पढ़ाने के अलावा पत्रकारिता राजनीतिक और साहित्य पर लेखन में थी। 1942 के आसपास वे वामपंथी विचारधारा की ओर झुके। ताउम्र गरीबी से लड़ते हुए और रोगों का मुकाबला करते हुए 11 सितम्बर, 1964 को नई दिल्ली में मुक्तिबोध की मृत्यु हो गयी।

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