हरफनमौला ही नहीं सबसे खतरनाक खिलाड़ी थे क्लूजनर, हर गेंद को बाउंड्री पार कराने की रखते थे क्षमता

हरफनमौला ही नहीं सबसे खतरनाक खिलाड़ी थे क्लूजनर, हर गेंद को बाउंड्री पार कराने की रखते थे क्षमता

By: Aryan Paul
September 03, 16:09
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New Delhi:

1999 का वर्ल्ड कप भले ही ऑस्ट्रेलिया ने जीता हो, लेकिन जलवे तो इसी खिलाड़ी के थे, अकेले दम पर अपनी टीम को लगभग फाइनल में पहुंचा ही दिया इस जुलू ने । जी हां हम बात कर रहे हैं 1999 वर्ल्ड कप के मैन ऑफ द टूर्नामेंट रहे लांस क्लूजनर की। 4 सितंबर 1971 को डरबन में जन्मे लांस क्लूजनर साउथ अफ्रीका के महान ऑलराउंडर रहे हैं।

1999 वर्ल्ड कप में क्लूजनर प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट रहे थे। 2000 में क्लूजनर को विज्डन क्रिकेटर ऑफ द ईयर चुना गया। 1999 वर्ल्ड कप में क्लूजनर ने चार मैन ऑफ द मैच अवॉर्ड जीते थे। 

बता दें कि आक्रामक बल्लेबाजी के साथ आक्रामक रवैये के लिए भी जाने जाते हैं लांस क्लूजनर । दक्षिण अफ्रीका के पूर्व क्रिकेटर हैं लांस क्लूजनर, जिनका निक नेम है जुलू। जुलू इसलिए क्योंकि उनकी अफ्रीकन देशी भाषा जूलू पर खासी पकड़ है। एक कुशल बल्लेबाज, क्लूजनर ने वनडे क्रिकेट में अपने कारनामों से नाम कमाया| गेंद को बाउंड्री के बाहर पहुंचाने की उनकी क्षमता और बल्लेबाज़ी में कभी ना हार मानने वाले रवैये ने दक्षिण अफ्रीका को 90 के अंतिम दशक में क्रिकेट का सिरमौर बनने में अहम भूमिका निभायी |

लांस क्लूजनर कई कारणों से क्रिकेट जगत में याद किये जाते रहेंगे| खासकर गेंद को मारने के उनके स्टाइल और बॉलर को रूला देने वाली उनकी तेज गेंदबाजी के लिए भी उनके फैन उन्हें हमेशा याद करते रहेंगे । हालांकि जब दक्षिण अफ़्रीकी क्रिकेट टीम 1999 और 2003 में विश्व कप से बाहर हुई, तो उस दौरान टीम की कमान उन्हीं के हाथों में थी| एक धारदार तेज गेंदबाज के रूप में क्लूजनर, डोनाल्ड और पोलाक के आदर्श थे| उनकी गेंदबाजी का नमूना कोलकाता में उनके शुरूआती टेस्ट मुकाबले में ही मिल गया था, जब उन्होंने भारतीयों को हैरान करते हुए 8/64 की शानदार गेंदबाजी की थी| गेंद और बल्ले दोनों में एक तरह से आक्रामक क्लूजनर हारी हुई बाजी को भी जीत में बदलने की हिम्मत रखते थे ।

एक वाकया ऐसा भी हुआ था, जब क्लूजनर बहुत पिटे थे, बता दें कि अजहर 1996 में भारत, दक्षिण अफ्रीका सीरीज के दूसरे मैच में छह रन के निजी स्कोर पर चोटिल गये थे। जब दोबारा बल्लेबाजी के लिए उतरे तो भारतीय टीम पर फॉलो आन का खतरा मंडरा रहा था। तब अजहरुद्दीन ने पहला टेस्ट मैच खेल रहे दक्षिणी अफ्रीकी गेंदबाज क्लूजनर को दिन में तारे दिखा दिए थे। अजहर ने 74 गेंदों पर शतक लगाया था, हालांकि भारत वो टेस्ट मैच हार गया था । 

क्लूजनर ऐसे कुछ खिलाड़ियों में है जिनके पास टेस्ट की तुलना में बेहतर वनडे बल्लेबाजी का अनुभव है। चोट ने क्लूजनर को अपनी स्पीड कम करने के लिए मजबूर किया, लेकिन आसानी से ना हार मानने वाले क्लूजनर ने कुछ और तरीकों से अपना हुनर बनाए रखा। ऑफ कटर एक ऐसे हथियार था जो बल्लेबाजों को परेशान करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। क्लूजनर का फार्म वेस्टइंडीज (2000-01) और ऑस्ट्रेलिया (2001-02) के लिए दौरे पर फीका होना शुरू हुआ। उनके लंबे समय तक खराब फॉर्म ने उन्हें कुछ समय के लिए टीम से बाहर कर दिया, लेकिन 2003 विश्व कप के लिए वे टीम में वापस जगह पाने में कामयाब रहे। 

क्लूजनर ने 2003-04 में वेस्टइंडीज के खिलाफ वनडे सीरीज से वापसी की और 2004 में श्रीलंका के दौरे के लिए टेस्ट में वापसी की। हालांकि यह बहुत ज्यादा समय तक नहीं रहा और क्लूजनर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया । उसके बाद उन्होंने अपने दक्षिण अफ्रीकी मित्र केपलर वेसेल्स के साथ नॉर्थहेम्पटनशायर के लिए करार किया।

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