सरकारी कॉलेज के बच्चों के पास नहीं थे जूते के पैसे,फिर भी रेस में दौड़़ कर बनें चैंपियन

सरकारी कॉलेज के बच्चों के पास नहीं थे जूते के पैसे,फिर भी रेस में दौड़़ कर बनें चैंपियन

By: Shalu Sneha
October 13, 09:10
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New Delhi: गुरुवार को बैंगलुरु में आयोजित 53 वें बैंगलोर यूनिवर्सिटी एथलेटिक्स की बैठक में सरकारी महाविद्यालयों के लगभग 30 एथलीट बिना जूते पहने दौड़ें और जीत दर्ज करवाई। वहीं एक शारीरिक शिक्षा के शिक्षक के मुताबिक इस तीन दिवसीय समारोह में लगभग 30 छात्र श्री कन्तेराव में नंगे पांव आधे टूटे ट्रैक पर दौड़े थे। जहां फाइनल में उनका मुकाबला वेलॉफ़ प्रतिद्वंद्वियों से था। 

बता दें कि एक कोच के अनुसार नंगे पैर ऐसे दौड़ना खतरे की बात है क्योंकि ऐसे किसी को चोट लगी हो सकती है। आर्टिफिशियल ट्रैक पर दौड़ने के कारण एथलीट के पैरों में फफोले या छाले हो सकते हैं। लेकिन नंगे पांव दौड़ना इन एथलीट की मजबूरी है क्योंकि इसमें से अधिकतर लोग गरीब परिवार से है जो कि स्पाईक्स वाले जूते खरीदने में असफल हैं। वहीं एक  5000 मीटर, 4x400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक जीता और गुरुवार को 1,500 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीता है चित्रा एम ए। जिनका कहना है कि कई चैंपियंस के लिए नंगे पांव दौड़ना कोई नई बात नहीं है। हम देश की गरीबी से भी ऐसे ही मुकाबला कर रहे हैं। साथ ही चित्रा ने ये भी कहा है कि मेरे पास जूते खरीदने के पैसे नहीं थे इसलिए में केवल मौजो में दौड़ी।  चित्रा, जो खो-खो में एक विश्वविद्यालय चैंपियन भी रह चुकी है, ने पिछली बार भी पदक जीते और मंगलगुरु में इंटर-वर्सी क्रॉस-कंट्री मिडल मैनेजमेंट में बेंगलुरु विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया।

जब कॉलेज अधिकारी से ये पूछा गया कि क्यों कॉलेज छात्रों से एकत्र किए गए खेल फीस का उपयोग करने में और किट देने में असमर्थ हैं। तो कॉलेज के अधिकारियों ने बताया कि हजारों छात्रों के साथ बड़े कॉलेजों के लिए धन उपयोगी होता है "कई कॉलेजों में 300-400 छात्रों की ताकत है, इसलिए छात्रों से एकत्र खेल निधि- 180 रुपये प्रति हेड-पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यह सभी खेलों का संचालन करने के लिए प्रयोग किया जाता है, न केवल एथलेटिक्स।

बैंगलोर विश्वविद्यालय के शारीरिक शिक्षा निदेशक टी. लिंगराजु ने कहा कि वह नंगे पांव चलने वाले कई एथलीटों को देखना काफी निराशा जनक है। उन्होंने कहा, "इस मुद्दे को देखना कॉलेजों का काम है।साथ ही उन्होनें ये भी कहा कि खेल निधि का एक हिस्सा कॉलेजों के साथ इस तरह के प्रयोजनों के लिए है। उन्हें एथलीटों की मदद के लिए इसका उपयोग करना चाहिए।

  

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