40 गुना स्वच्छता बढ़ने के बावजूद बिमारियों का बोझ उठाने को मजबूर है भारत का हर एक नागरिक

40 गुना स्वच्छता बढ़ने के बावजूद बिमारियों का बोझ उठाने को मजबूर है भारत का हर एक नागरिक

By: Sachin
November 14, 21:11
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New Delhi: उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने मंगलवार को कहा कि पूरे देश में बच्चों में कुपोषण के मामले, सभी स्वास्थ्य समस्याओं का 15 फीसदी हैं, जो अपने आप में चिंता का विषय है। वहीं, अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के लिए दूषित जल और वायु प्रदुषण को जिम्मेदार ठहराया है।

नायडू ने कहा, 'स्वच्छ भारत अभियान के 2 साल बाद देश में 40 फीसदी स्वच्छता तो बढ़ी, लेकिन फिर भी देश का हर नागरिक बिमारियों का बोझ उठाने को मजबूर है।' देश में हृदय रोग और मधुमेह जैसी बीमारियों से हो रही असमय मौतों पर गहरी चिंता जताते हुए इनकी रोकथाम के लिए स्वास्थ्य नीति में बदलाव और युद्धस्तर पर समयबद्ध कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता जताई।

उन्होंने आगे कहा कि वायु प्रदुषण के कारण आज दुनिया में, हृदय रोग, श्वसन रोग और श्वसन संबंधी बिमारियों का जोखिम बढ़ता ही जा रहा है। सिर्फ वायु प्रदुषण ही दुनियाभर के लिए एक बढ़ा खतरा बनता जा रहा है। गौरतलब है कि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की वजह से दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में इन दिनों प्रदुषण का स्तर खतरे के निशान को भी पार कर चुका है, जिसकी वजह से लोगों को श्वास संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

नायडू ने देश के सभी राज्यों के स्वास्थ्य की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी करते हुए यह बात कही। अपनी तरह की पहली यह रिपोर्ट भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन आफ इंडिया और इंस्टिच्यूट आफ हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवैल्यूएशन ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सहयोग से तैयार की है।

उपराष्ट्रपति ने आगे कहा, पिछले 25 वर्षों में देश स्वास्थ्य की गंभीर स्थिति को लेकर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। हृदय रोग, पक्षाघात तथा मधुमेह जैसी असंचारी बीमारियों एवं सड़क हादसों में असमय मौतों की संख्या बढ़ गयी है। इसके साथ ही बड़ी संख्या में लोग तपेदिक, डायरिया और सांस में संक्रमण जैसी बीमारियों की चपेट में है।'

उन्होंने आगे कहा, 'इन बीमारियों से निपटने के लिए स्वास्थ्य नीति एवं जीवन शैली में बदलाव और रोकथाम की जरूरत पर जोर देते हुए उन्होंने केंद्र ,राज्य और स्थानीय निकायों से युद्धस्तर पर कार्यक्रम चलाने चाहिए।'

वहीं, Lancet की रिपोर्ट के अनुसार, 1990 से भारत में बाल और मातृ कुपोषण के कारण बीमारी का बोझ काफी कम हो चुका है, हालांकि यह 2016 में भारत में कुल बीमारी के बोझ के 15 प्रतिशत के लिए सबसे बड़ा जोखिम कारक है। प्रमुख राज्यों में यह बोझ सबसे ज्यादा है, और यह पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक है। बाल और मातृ कुपोषण मुख्य रूप से नवजात विकार, पोषण संबंधी कमियों, अतिसार बीमारियों, कम श्वसन संक्रमण और अन्य संक्रमणों के जोखिम को बढ़ाकर बीमारी के बोझ भी बढ़ाता है।

वहीं, भारत में बच्चे और मातृ कुपोषण के कारण बीमारी का बोझ 2016 में चीन की तुलना में 12 गुना अधिक है। भारतीय राज्यों में केरल में सबसे कम बोझ था, लेकिन यह भी चीन की तुलना में प्रति व्यक्ति 2.7 गुना अधिक था। देश में पोषण संबंधी हस्तक्षेप के दशकों बाद इस स्थिति को भारत में स्वास्थ्य सुधार के सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक के रूप में सुधारा जाना चाहिए। 2001 में स्थापित, एम्पोवर्ड एक्शन ग्रुप (ईएजी) में आठ राज्यों - बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं, जो कि जनसंख्या वृद्धि में पीछे रहे हैं।

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