हिंदू-मुसलमान के खांचे में न बांटें, यह बेबस मानवता की हत्या है

हिंदू-मुसलमान के खांचे में न बांटें, यह बेबस मानवता की हत्या है

By: Nihar Ranjan Saxena
December 07, 18:12
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New Delhi: सोशल मीडिया के दौर में अब कोई भी घटना सेकंडों में वायरल होती है। राजस्थान के राजसमंद में बुधवार को एक मजदूर की निर्मम हत्या का वीडियो भी इसका अपवाद नहीं है।

इसे लव-जेहाद का तमगा देकर मीडिया में प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है। इसे देखने के बाद प्रश्न उठता है क्या वास्तव में यह हिंदू-मुसलमान में बढ़ती वैमनस्य की खाई है? या किसी कुंठित मानसिकता के शिकार एक ठेकेदार द्वारा अपनी कमतरी को छिपाने के लिए उठाया गया कदम? या क्या किसी एक व्यक्ति के अपराध की सजा पूरे समाज को दी जा सकती है? सच तो यह है कि यह घटना बताती है कि किस तरह कोई एक शख्स अपनी कुत्सित सोच के दबाव चले उठाए गए कदम को धर्म की आड़ देता है। यह घटना हरेक समझदार आदमी को सोचने पर मजबूर करती है कि हम आज किस ओर जा रहे हैं।

राजसमंद में मजदूरी करने आए पश्चिम बंगाल के मालदा के 50 वर्षीय मजदूर अफराजुल को आरोपी शंभुदयाल रैगर दोस्ती का वास्ता देकर एक सूनसान स्थान पर ले गया। वहां रैगर ने शंभुदयाल पर कुल्हाड़ी से निर्ममता से वार करने शुरू किए। फिर चापड़ से वार किए और अंत में पेट्रोल डालकर जला दिया। हद तो यह रही कि बेखौफ आरोपी ने इस पूरी घटना का न सिर्फ वीडियो बनवाया, बल्कि अपनी आपराधिक मानसिकता को उचित ठहराने के लिए लव जेहाद के विरोध में उठाया गया एक कदम बताया।

वीडियो के वायरल होते ही रैगर को गुरुवार को गिरफ्तार कर लिया गया। जाहिर है यह मामला दुर्लभतम से दुर्लभतम अपराध की श्रेणी में आता है। इसे समझते हुए इसे हिंदू-मुसलमान के खांचे में बांटकर नहीं देखना चाहिए। यह मामला उस माहौल की देन है, जो चुनावी लाभ के लिए जहरीला बनाया जा रहा है। इस फैल रहे जहर के प्रभाव में कोई भी आ सकता है और ऐसी अमानवीय घटना को अंजाम दे सकता है। कभी गो-भक्षक होने पर हत्या हो रही है, तो कहीं टोपी पहनने पर, इसके चंद उदाहरण भर हैं।

अपराध के मनोविज्ञान को समझें तो यह सारे जुमले कुंठा को छिपाने के लिए उछाले जाते हैं। अपनी कमतरी का अहसास दूर करने के लिए बेबस-मजलूम पर बहादुरी दिखाई जाती है और उसे कुछ और नाम दिया जाता है। इस घटना में भी पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया और जांच के लिए टीम बना दी है। लेकिन क्या यह इस तरह के अपराध के लिए पर्याप्त है? जवाब है नहीं। जिस तरह निर्भया प्रकरण में एकजुट समाज के चलते सरकारी मशीनरी को घुटनों पर आना पड़ा था, कुछ वैसा ही ऐसी घटनाओं के विरोध में किया जाना चाहिए। 

हिंदू-मुसलमान की बात करने वाले क्यों भूल रहे हैं कि इस देश में जांत-पांत, ऊंच-नीच का तमगा सबसे पहले किसने दिया था? ऐसा करने वाले मुसलमान नहीं थे, बल्कि हिंदू ही थे। उस वक्त समाज में प्रभुत्व और वर्चस्व की लड़ाई में ऐसा किया गया था, क्योंकि तब मुसलमान नहीं था। आज मुसलमान है तो वह आसान शिकार है वर्चस्व और प्रभुत्व की लड़ाई का निवाला बनाने के लिए।

ऐसी घटना पर हर उस भारतीय को शर्मिंदा होने की जरूरत है जिसका रत्ती भर भी मानवता में विश्वास है। जरा सोचिए परिवार का पेट पालने के लिए दूसरे राज्य में गए एक मजदूर को लव-जेहाद के नाम पर मार दिया गया। यह प्रवृत्ति तो हमें पाषाण काल में लेकर जा रही है। नहीं, पाषाण काल भी शायद इससे बेहतर रहा होगा। 

राजनीतिक पार्टियों को सोचना होगा कि उनके द्वारा महज चंद वोटों की खातिर फैलाया जा रहा जहर एक न एक दिन उन्हें भी डसेगा। इंतजार सिर्फ समय का है। क्योंकि एक बार मुसलमान दबा दिए गए, तो फिर वर्चस्व और प्रभुत्व की लड़ाई का कौन शिकार बनेगा? हम... क्योंकि आज हम अपना मुंह बंद रख कर खुद को कमजोर बना रहे हैं और ऐसा कर इन आपराधिक ताकतों को अपने ऊपर हावी होने देने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं जो येन-केन प्रकारेण अपने को ही जिलाए रखना चाहती हैं। हिंदू-मुसलमान के नाम पर या क्षेत्रवाद या जातिवाद के नाम पर। सोचिए जल्दी...कहीं देर न हो जाए।

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