क्रूर शासक रहे औरंगजेब के इस पुत्र से गुरु गोविंद सिंह की थी गहरी दोस्ती

क्रूर शासक रहे औरंगजेब के इस पुत्र से गुरु गोविंद सिंह की थी गहरी दोस्ती

By: Aryan Paul
October 13, 19:10
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New Delhi:

बहादुर शाह प्रथम दिल्ली का 7वां मुग़ल बादशाह था। जिसे शहज़ादा मुअज्ज़म के नाम से भी जाना जाता है। बहादुरशाह प्रथम औरंगज़ेब के दूसरे पुत्र थे। अपने पिता के भाई और शाहशुजा के साथ बड़े भाई के मिल जाने के बाद शहज़ादा मुअज्ज़म ही औरंगज़ेब के संभावी उत्तराधिकारी थे। बहादुर शाह प्रथम को शाहआलम प्रथम या आलमशाह प्रथम के नाम से भी जाना जाता है। बहादुर शाह प्रथम का जन्म 14 अक्तूबर 1643 को मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में हुआ। बादशाह बहादुर शाह प्रथम के चार पुत्र थे- जहांदारशाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहानशाह। बहादुर शाह प्रथम को 1663 में दक्षिण के दक्कन पठार क्षेत्र और मध्य भारत में पिता का प्रतिनिधि बनाकर भेजा गया। 1683-1684 में उन्होंने दक्षिण बंबई और गोवा के पुर्तग़ाली इलाक़ों में मराठों के ख़िलाफ़ सेना का नेतृत्व किया, लेकिन पुर्तग़ालियों से मदद ना मिलने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। आठ वर्ष तक तंग किए जाने के बाद उन्हें उनके पिता ने 1699 में क़ाबुल का सूबेदार नियुक्त किया।

औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उसके 63 वर्षीय पुत्र मुअज्ज़म ने लाहौर के शाहदौला नाम के पुल पर मई 1707 में 'बहादुर शाह' के नाम से अपने को सम्राट घोषित किया। बूंदी के बुधसिंह हाड़ा और अम्बर के विजय कछवाहा को उसने पहले से ही अपने ओर कर लिया था। उनके जरिए से उसे बड़ी संख्या में राजपूतों का समर्थन हासिल हो गया। उत्तराधिकार को लेकर बहादुरशाह प्रथम और आमजशाह में सामूगढ़ के पास जाजऊ पर 18 जून, 1708 को युद्ध हुआ, जिसमें आजमशाह और उसके दो बेटे 'बीदर बख़्त' तथा 'वलाजाह' मारे गये। बहादुरशाह प्रथम को अपने छोटे भाई कामबख़्श से भी मुग़ल सिंहासन के लिए लड़ाई लड़नी पड़ी। कामबख़्श ने 13 जनवरी, 1709 को हैदराबाद के नजदीक बहादुशाह प्रथम के विरुद्ध युद्ध किया। युद्ध में पराजित होने के उपरान्त कामबख़्श की मृत्यु हो गई। अपनी विजय के बाद बहादुर शाह प्रथम ने अपने समर्थकों को नई पदवियां तथा ऊचें दर्जे पर बिठाया। मुनीम ख़ां को वज़ीर नियुक्त किया। औरंगज़ेब के वज़ीर, असद ख़ां को वकील-ए-मुतलक़ का पद दिया और उसके बेटे ज़ुल्फ़िक़ार ख़ां को मीर बख़्शी बनाया गया। बहादुरशाह प्रथम गद्दी पर बैठने वाला सबसे वृद्ध मुग़ल शासक था। जब वह गद्दी पर बैठा, तो उस समय उसकी उम्र 63 वर्ष थी। वह अत्यन्त उदार, आलसी तथा उदासीन व्यक्ति था। इतिहासकार ख़फ़ी ख़ां ने कहा है कि बादशाह राजकीय कार्यों में इतना अधिक लापरवाह था, कि लोग उसे शाहे बेख़बर कहने लगे थे।

बहादुर शाह प्रथम के शासन काल में दरबार में दो गुट बन गए। बहादुरशाह प्रथम शिया था, और उस कारण दरबार में दो दल विकसित हो गए थे। ईरानी दल, तुरानी दल। ईरानी दल शिया मत को मानने वाले थे, जिसमें असद ख़ां और उसके बेटे जुल्फिकार ख़ां जैसे सरदार थे। तुरानी दल सुन्नी मत के समर्थक थे जिसमें चिनकिलिच ख़ां और फ़िरोज़ ग़ाज़ीउद्दीन जंग जैसे लोग थे। बहादुरशाह प्रथम ने उत्तराधिकार के युद्ध के समाप्त होने के बाद सर्वप्रथम राजपूताना की ओर रुख़ किया। उसने मारवाड़ के राजा अजीत सिंह को हराकर, उनसे 3500 का मनसब एवं महाराज की उपाधि प्रदान की, परन्तु बहादुर शाह प्रथम के दक्षिण जाने पर अजीत सिंह, दुर्गादास एवं जयसिंह कछवाहा ने मेवाड़ के महाराज अमरजीत सिंह के नेतृत्व में अपने को स्वतंत्र घोषित कर लिया और राजपूताना संघ का गठन किया। बहादुरशाह प्रथम ने इन राजाओं से संघर्ष करने से बेहतर सन्धि करना ठीक समझा और उसने इन शासकों को मान्यता दे दी।

8 जून 1707 ई. आगरा के पास जांजू के पास लड़ाई लड़ी गई, जिसमें बहादुरशाह की जीत हुई। इस लड़ाई में गुरु गोविन्द सिंह की हमदर्दी अपने पुराने मित्र बहादुरशाह के साथ थी। कहा जाता है कि गुरु जी ने अपने सैनिकों द्वारा जांजू की लड़ाई में बहादुरशाह का साथ दिया, उनकी मदद की। इससे बादशाह बहादुरशाह की जीत हुई। बादशाह ने गुरु गोविन्द सिंह जी को आगरा बुलाया। उसने एक बड़े क़ीमती वस्त्र, गहना जिसकी क़ीमत 60 हज़ार रुपये थी, गुरुजी को भेंट की। मुग़लों के साथ एक युग पुराने मतभेद समाप्त होने की सम्भावना थी। गुरु साहब की तरफ से 2 अक्टूबर 1707 ई. और धौलपुर की संगत की तरफ लिखे हुक्मनामा के कुछ शब्दों से लगता है कि गुरुजी की बादशाह बहादुरशाह के साथ मित्रतापूर्वक बातचीत हो सकती थी। जिसके खत्म होने से गुरु जी आनंदपुर साहिब वापस आ जांएगे, जहां उनको आस थी कि खालसा लौट के इकट्ठा हो सकेगा।

बादशाह बहादुरशाह ने राजपूतों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए कूच किया ही था कि उसके भाई कामबख़्श ने बग़ावत कर दी। बग़ावत दबाने के लिए बादशाह दक्षिण की तरफ़ चला और विनती करके गुरु जी को भी साथ ले गया। पंजाब में 1708 में गुरु गोविन्द सिंह की मुत्यु के बाद सिक्खों ने बन्दा सिंह के नेतृत्व में मुग़लों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उसने मुसलमानों के विरुद्ध लड़ने के लिए पंजाब के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में सिक्खों को इकट्ठा किया तथा कैथल, समाना, शाहबाद, अम्बाला, क्यूरी और सधौरा पर क़ब्ज़ा कर लिया। उसकी सबसे बड़ी विजय सरहिन्द के गर्वनर नजीर ख़ां के खिलाफ थी, जिसे उसने हराकर मार डाला। उसके बारे में कहा जाता है कि, उसमें गुरु गोविन्द सिंह की आत्मा का निवास था। उसने स्वयं को 'सच्चा बादशाह' घोषित किया, अपने टकसाल चलायीं और एक स्वतंत्र सिक्ख राज्य की स्थापना का प्रयत्न किया। 

बन्दा ने सरहिन्द, सोनीपत, सधौरा, और उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर खूब लूटपाट की। बहादुरशाह प्रथम ने सिख नेता

बन्दा को सजा देने के लिए 26 जून, 1710 को सधौरा में घेरा डाला। यहां से बन्दा भागकर लोहागढ़ के किले में आ गए। बहादुरशाह ने लोहगढ़ को घेरकर सिखों से कड़ा संघर्ष करते हुए दुर्ग पर क़ब्ज़ा कर लिया। 1711 में मुग़लों ने फिर से सरहिन्द पर अधिकार कर लिया। लोहगढ़ का क़िला गुरु गोविन्द सिंह ने अम्बाला के उत्तर-पूर्व में हिमालय की तराई में बनाया था। बहादुरशाह प्रथम ने बुन्देला सरदार छत्रसाल से मेल-मिलाप कर लिया। छत्रसाल एक निष्ठावान सामन्त बना रहा। बादशाह ने जाट सरदार चूड़ामन से भी दोस्ती कर ली। चूड़ामन ने बन्दा बहादुर के ख़िलाफ़ अभियान में बादशाह का साथ दिया।

बहादुर शाह प्रथम के विषय में प्रसिद्ध लेखक 'सर सिडनी ओवन' ने लिखा है कि यह अन्तिम मुग़ल सम्राट था, जिसके विषय में कुछ अच्छे शब्द कहे जा सकते हैं। इसके पश्चात् मुग़ल साम्राज्य का तीव्रगामी और पूर्ण पतन मुग़ल सम्राटों की राजनीतिक तुच्छता और शक्तिहीनता का कारण था। सर सिडनी ओवन का कहना काफ़ी हद तक सही जान पड़ता है, क्योंकि वे मुग़ल शासक जो अपने ऐशो-आराम में ही डूबे रहते थे, जिन्हें शासन और साम्राज्य की कोई चिंता ही नहीं थी, उनको प्रजा ने निम्न नामों से पुकारना प्रारम्भ कर दिया था- बहादुरशाह - शाहे बेख़बर, जहाँदारशाह - लम्पट मूर्ख, फ़र्रूख़सियर - घृणित कायर, मुहम्मदशाह - रंगीला ।

बहादुर शाह प्रथम के दरबार में 1711 में एक डच प्रतिनिधि शिष्टमण्डल 'जेसुआ केटेलार' के नेतृत्व में गया। इस शिष्टमण्डल का दरबार में स्वागत किया गया। इस स्वागत में एक पुर्तग़ाली स्त्री 'जुलियानी' की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। उसकी इस भूमिका के लिए उसे 'बीबी फिदवा' की उपाधि दी गयी। 26 फ़रवरी, 1712 को बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु हो गयी। मृत्यु के पश्चात् उसके चारों पुत्रों, जहाँदारशाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहानशाह में उत्तराधिकार का युद्ध आरंभ हो गया। जिसके कारण बहादुरशाह का शव एक महीने तक दफनाया नहीं जा सका।

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