स्वामी प्रभुपाद: एक ऐसे प्रचारक, जिनकी वजह से सारी दुनिया में गूंजती है कृष्ण नाम की धुन

स्वामी प्रभुपाद: एक ऐसे प्रचारक, जिनकी वजह से सारी दुनिया में गूंजती है कृष्ण नाम की धुन

By: Sachin
November 13, 16:11
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New Delhi: आपने Iskcon temple का नाम तो सुना ही होगा। दुनियाभर में कई जगह पर इनकी स्थापना की गई हैं इस्कॉन मंदिर का पूरा नाम इंटरनेशनल सोसाइटी फार कृष्ण कॉनिशयसनेस है। इसके फाउंडर थे कृष्णकृपामूर्ति श्रीमद् ए.सी. भक्तिवेदांता स्वामी प्रभुपाद।

स्वामी प्रभुपाद के अनुयायी उन्हें आध्यात्मिक गुरू के रूप में पूजते हैं। स्वामी प्रभुपाद एक गौड़ीय वैष्णव धर्मगुरू तथा धर्मप्रचारक थे। स्वामी जी का निधन 14 नवंबर 1977 को यानि आज के ही दिन हुआ था। उनकी पुण्यतिथि के मौके पर हम आपको बताने जा रहे है स्वामी प्रभुपाद से जुड़ी ख़ास बातें…

स्वामी प्रभुपाद का जन्म 1 सितंबर 1896 को कलकत्ता में हुआ था। उनके बचपन का नाम अभय चरण डे था। उनके पिता गौर मोहन डे कपड़े के व्यापारी थे और उनकी माता का नाम रजनी था। उनका घर उत्तरी कोलकाता में 151, हैरिसन रोड पर था। गौर मोहन डे न अपने बेटे अभय चरण का पालन पोषण एक कृष्ण भक्त के रूप में किया। श्रील प्रभुपाद ने 1922 में अपने गुरु महाराज श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी से भेंट की। इसके ग्यारह वर्ष बाद 1933 में वे प्रयाग में उनके विधिवत दीक्षा प्राप्त शिष्य हो गए।

वे बीसवीं सदी के प्रसिद्ध धर्मप्रचारक और गौड़ीय वैष्णव धर्मगुरू रहे। स्वामी प्रभुपाद भक्तिसिद्धांत ठाकुर सरस्वती के शिष्य थे जिन्होंने इनको अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से वैदिक ज्ञान के प्रसार के लिए प्रेरित और उत्साहित किया। 1944 ई. में श्रीलप्रभुपाद ने बिना किसी की सहायता के एक अंग्रेजी पाक्षिक पत्रिका आरंभ की जिसका संपादन, पाण्डुलिपि का टंकण और मुद्रित सामग्री के पु्रफ शोधन का सारा कार्य वे स्वयं करते थे। बेहद संघर्ष और अभावों के बावजूद श्रीलप्रभुपाद ने इस पत्रिका को बंद नहीं होने दिया। 

अब यह पत्रिका बैक टू गॉडहैड पश्चिमी देशों में भी चलाई जा रही है और तीस से अधिक भाषाओं में छप रही है। श्रील प्रभुपाद के दार्शनिक ज्ञान एवं भक्ति की महत्ता पहचान कर गौडीय वैष्णव समाज ने 1947 ईं. में उन्हें भक्ति वेदांत की उपाधि से सम्मानित किया। 1950 ईं. में चौवन वर्ष की उम्र में श्रील प्रभुपाद ने गृहस्थ जीवन से अवकाश लेकर वानप्रस्थ ले लिया जिससे वे अपने अध्ययन और लेखन के लिए अधिक समय दे सकें। श्रीलप्रभुपाद ने फिर श्री वृंदावन धाम की यात्रा की, जहां वे बड़ी ही सात्विक परिस्थितियों में मध्यकालीन ऐतिहासिक श्री राधा दामोदर मंदिर में रहे।

वहां वे अनेक वर्षों तक गंभीर अध्ययन एवं लेखन में संलग्न रहे। 1959 ई. में उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया। श्री राधा दामोदर मंदिर में ही श्रील प्रभुपाद ने अपने जीवन के सबसे श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण ग्रंथ का आरंभ किया था। यह ग्रंथ था अठारह हजार श्लोक संख्या के श्रीमद्भागवत पुराण का अनेक खण्डों में अंग्रेजी में अनुवाद और व्याख्या।

इस्कॉन की स्थापना और प्रचार-प्रसार

अपने गुरू भक्तिसिद्धांत ठाकुर सरस्वती से प्रेरित होकर स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में इस्कॉन की स्थापना की और पश्चिमी देशों में इसका प्रचार-प्रसार किया। इस्कॉन की स्थापना करना स्वामी प्रभुपाद के लिए इतना आसान नहीं था। इसके लिए उन्होंने कई दिक्कतें भी उठाईं। 1965 में वे न्यूयॉर्क के लिए निकले, जब वे न्यूयॉर्क आए थे तब उनके पास केवल सात डॉलर और पवित्र ग्रंथों का अनुवाद किए हुए कुछ पन्ने थे। पश्चिम देशों में अपने धर्म का प्रचार करने के लिए उन्होंने न्यूयार्क में टॉम्पकिन स्कवायर पार्क में भागवत गीता और उसके कुछ कीर्तन सुनाना शुरू किए। उनके भागवत गीता के हर संदेश के साथ न्यूयार्क का युवा जुड़ता चला जाता था। इन्हीं युवाओं की मदद से उन्होंने 1966 में इस्कॉन की स्थापना की।

इस्कॉन की स्थापना के साथ ही पश्चिमी देशों में वैष्णव संप्रदाय का तेजी से प्रचार-प्रसार होने लगा। इस्कॉन में भक्तियोग और कृष्ण की पूजा को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। इस्कॉन का आज दुनियाभर में काफी नाम हैं इसके 550 से ज्यादा सेंटर अलग-अलग देशों में संचालित हैं।

इस्कॉन के अनुयायी आपको हमेशा जोर-जोर से हरे कृष्णा कीर्तन गाते हुए मिलेंगे। अनुयायी हमेशा हाथ में जाप के लिए तुलसी माला रखते हैं और ‘हरे कृष्णा’ कीर्तन गाते हैं। इस कीर्तन में विष्णु के दो अवतार ‘कृष्ण’ तथा ‘राम’ दोनों का ही समावेश है।

इसकी स्थापना करने वाले स्वामी प्रभुपाद तो अब इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनका सपना और उनकी जिंदगी का मकसद इस दुनिया में अभी भी चल रहा हैं।

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