तमिलनाडु में नहीं होगा जल्लीकट्टू, पोंगल से पहले पुनर्विचार याचिका खारिज

तमिलनाडु में नहीं होगा जल्लीकट्टू, पोंगल से पहले पुनर्विचार याचिका खारिज

By: Ikram Saifi
January 12, 15:01
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NEW DELHI : तमिलनाडु में पोंगल से पहले जल्लीकट्टू पर्व पर लगे बैन को हटाने के मामले में दायर की गई याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आदेश का ड्राफ्ट तैयार है, लेकिन शनिवार से पहले फैसला सुनना संभव ही नहीं है। शनिवार 14 जनवरी को ही तमिलनाडु में पोंगल मनाया जाएगा, जिसमें जल्लीकट्टू खेल भी होता है, जिसमें सांडों को काबू किया जाता है। शीर्ष अदालत ने सबसे पहले साल 2014 में इस खेल पर यह कहते हुए बैन लगाया था कि यह जानवरों के प्रति क्रूरता है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में लगाई गई राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए अपना आदेश बरकरार रखा था।

वहीं सत्तारूढ़ पार्टी एआईएडीएमके ने कहा कि मुख्यमंत्री इस बारे में एक्शन लेंगे। पार्टी नेता सीआर सरस्वती ने कहा कि अम्मा (जयललिता) को जल्लीकट्टू बहुत पसंद था। हम केंद्र सरकार से इस मामले में समर्थन की मांग करते हैं। दूसरी ओर पुलिस ने कुडल्लोर में जल्लीकट्टू के आयोजन को विफल कर दिया। एआईएडीएमके की जनरल सेक्रेटरी वीके शशिकला ने बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस खेल के आयोजन के लिए एक अध्यादेश लाने को कहा, ताकि इस खेल का आयोजन हो सके।

मोदी के लिखे खत में शशिकला ने कहा कि जानवरों के प्रति कोई क्रूरता नहीं होगी। तमिलनाडु में सांडों को भगवान के तौर पर पूजा जाता है। जो युवा उन्हें काबू करते हैं वह ध्यान रखते हैं कि सांडों को कोई दर्द ना हो। शशिकला से पहले राज्य के मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेलवम भी पीएम मोदी से यही दरख्वास्त लगा चुके हैं। शशिकला ने कहा कि जल्लीकट्टू पर बैन से राज्य के लोग काफी नाराज हैं जिनमें खासकर युवा शामिल हैं। इससे बैन हटाने की हर मुमकिन कोशिश की जानी चाहिए।


क्या है जल्लीकट्टू?

जल्लीकट्टू तमिलनाडु का एक परंपरागत खेल है, जिसमें बैल को काबू में किया जाता है। यह खेल काफी सालों से तमिलनाडु में लोगों द्वारा खेला जाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रांति का पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। इस खास मौके पर जल्लीकट्टू के अलावा बैल दौड़ का भी काफी जगहों पर आयोजन किया जाता है। एक्सपर्ट मानते हैं कि जल्लीकट्टू तमिल शब्द सल्ली और कट्टू से मिलकर बना है। जिनका मतलब सोना-चांदी के सिक्के होता है जो कि सांड के सींग पर टंगे होते हैं। बाद में सल्ली की जगह जल्ली शब्द ने ले ली।

कब शुरू हुआ?

माना जाता है कि सिंधु सभ्यता के वक्त जो अय्यर और यादव लोग तमिल में रहते थे उनके लिए सांड पालना आम बात थी। बाद में यह साहस और बल दिखाने वाली बात बन गई। बाद में बैल को काबू करने वाले को इनाम और सम्मान दिया जाने लगा। किसी सांड को काबू करने की प्रथा लगभग 2,500 साल पुरानी कही जा सकती है।

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