18 साल की उम्र में लिखा था पहला उपन्यास, लेखनी में रविंद्रनाथ टैगोर को भी दी थी टक्कर

18 साल की उम्र में लिखा था पहला उपन्यास, लेखनी में रविंद्रनाथ टैगोर को भी दी थी टक्कर

By: Naina Srivastava
September 14, 16:09
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New Delhi: बांग्ला के सुप्रसिद्ध शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय एक महान उपन्यासकार थे। शरदचंद्र का जन्म हुगली जिले के देवानंदपुर में हुआ। 18 साल की अवस्था में उन्होंने इंट्रेंस पास किया। इन्हीं दिनों उन्होंने "बासा" नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई। 

15 सितंबर 1878 ई. में जन्में शरदचंद्र हुगली जिले के एक छोटे से गांव देवानंदपुर में हुआ। बता दें कि शरदचंद्र के मां बाप के 9 संतान थे। शरदचंद्र  मां-बाप के 9 संतानों में से एक थे। शरतचन्द्र ललित कला के छात्र थे। लेकिन पैसों की तंगी की वजह से उन्हें बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। नौकरी की तलाश में वह बर्मा आ गए और लोक निर्माण विभाग में क्लर्क बन गए। शरदचंद्र ने कुछ वक्त यहां नौकरी की और फिर वापस कलकत्ता लौट गए। कलकत्ता आने के बाद उन्होंने अपने कलम से लेखनी से जादू बिखेरने लगे। बता दें कि जब वह बर्मा से लौटे तो उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास श्रीकांत लिखना शुरू किया।

 गरीबी और अभाव में पलने के बावजूद शरतचंद दिल के आला और स्वभाव के नटखट थे। वे अपने हम उम्र मामाओं और बाल सरणाओं के साथ खूब शराराते किया करते थे। जब शरत बर्मा से कलकत्ता आए तो अपनी कुछ रचनाएं कलकत्ते में एक मित्र के पास छोड़ गए। शरत को बिना बताए उनमें से एक रचना "बड़ी दीदी" का 1907 में धारावाहिक प्रकाशन शुरु हो गया। दो एक किश्त निकलते ही लोगों में सनसनी फैल गई और वे कहने लगे कि शायद रवींद्रनाथ नाम बदलकर लिख रहे हैं। शरत को इसकी खबर साढ़े पांच साल बाद मिली। कुछ भी हो ख्याति तो हो ही गई, फिर भी "चरित्रहीन" के छपने में बड़ी दिक्कत हुई। भारतवर्ष के संपादक कविवर द्विजेंद्रलाल राय ने इसे यह कहकर छापने से इन्कार कर दिया किया कि यह सदाचार के विरुद्ध है।

 शरत्चंद्र ने अनेक उपन्यास लिखे जिनमें पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, श्रीकांत, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, बाम्हन की लड़की, विप्रदास, देना पावना आदि प्रमुख हैं। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर "पथेर दावी" उपन्यास लिखा गया। पहले यह "बंग वाणी" में धारावाहिक रूप से निकाला, फिर पुस्तकाकार छपा तो तीन हजार का संस्करण तीन महीने में समाप्त हो गया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने इसे जब्त कर लिया। शरत के उपन्यासों के कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। कहा जाता है कि उनके पुरुष पात्रों से उनकी नायिकाएँ अधिक बलिष्ठ हैं।

        

प्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की मृत्यु 16 जनवरी साल 1938 ई. को हुई थी। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय को यह गौरव हासिल है कि उनकी रचनाएं हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में आज भी चाव से पढ़ी जाती हैं। लोकप्रियता के मामले में बंकिम चंद्र चटर्जी और शरतचंद्र रवीन्द्रनाथ टैगोर से भी आगे हैं।

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