MP में यात्राओं की धूम,कांग्रेसी दिग्गज राजनैतिक वैराग्य ले रहे या वापसी कर रहे,समझना मुश्किल

MP में यात्राओं की धूम,कांग्रेसी दिग्गज राजनैतिक वैराग्य ले रहे या वापसी कर रहे,समझना मुश्किल

By: Arvind Mohan
January 13, 12:01
0
New Delhi: मध्य प्रदेश मेँ इन दिनोँ यात्राओँ की धूम है। कांग्रेसी दिग्गज दिग्विजय सिन्ह राजनैतिक वैराग्य ले रहे हैँ या राजनैतिक वापसी कर रहे हैँ, यह समझना मुश्किल है, पर उनकी नर्मदा यात्रा खासी चर्चित और सफल है।

यह उनकी समझ और राजनैतिक कमाई का भी प्रमाण है कि उन्होँने दिल्ली की राजनीति से दरकिनार होने के संकेत देखकर और राज्य की राजनीति मेँ वेकेन्सी देखकर यह कदम उठाया। और इसका अन्य कहीँ क्या असर हुआ यह सामने आने से पहले भाजपा ने एकात्म यात्रा का आयोजन कर डाला-यह यात्रा खंडवा जिले के ओंकारेश्वर मेँ आदि शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची प्रतिमा का निर्माण करने एक लिये धातु जमा करने के लिये हो रही है। कहना न होगा कि इस पर सरदार पटेल की प्रतिमा के लिये लोहा जमा करने वाले भाजपा के अभियान का भी असर है। सरदार पटेल की हो या आदि शंकराचार्य की, अगर मूर्तियाँ लगाना किसी दल या समूह का राजनैतिक अभियान भी हो तो उससे कोई मतभेद रख सकता है, उसका विरोध करना या उसे एक प्रशासनिक मुद्दा बनाना सम्भव नहीँ है। पर मध्य प्रदेश मेँ यह हो रहा है और वहाँ राजनैतिक हलके से लेकर सोशल मीडिया तक पर आज दिग्गी राजा की नर्मदा यात्रा से ज्यादा चर्चा एकात्म यात्रा की है।


दलित आन्दोलन से कौन डरता है


असल मेँ यह यात्रा अधिकारियोँ की ‘उत्साहजनक’ भागीदारी के लिये ज्यादा चर्चा मेँ है। भाजपा के लोगोँ ने मंडला जिले की कलक्टर सुफिया फारूखी की वह तस्वीर आफिशियल ट्विटर एकाउंट से जारी किया जिसमेँ वे आदि शनकराचार्य की चरण पादुका सिर पर रखकर यात्रा मेँ शामिल हुईँ। उन्होँने इस यात्रा का भगवा झंडा लहराकर भी स्वागत किया। उनकी तस्वीरोँ के साथ भाजपा प्रवक्ता लोकेन्द्र पाराशर ने टिप्पणी की कि सूफिया साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश कर रही हैँ। राज्य मेँ जमाने से शासन कर रही पार्टी की तरफ से मिली वाहवाही का प्रभाव हो या स्वविवेक या चापलूसी की होड मेँ पीछे न छोटने का एहसास, सूफिया की करतूतोँ को विदिशा के कलक्टर अनिल सुचारी और दमोह के कलक्टर श्रीनिवास शर्मा भी इसी एकात्म यात्रा मेँ यह सब कर चुके हैँ। सम्भव है कि जब तक यह यात्रा पूरी को तब तक यह खेल भी आगे बढ चुका हो। आयोजन भाजपा का है या भाजपा सरकार का, यह संघ के अनेक आयोजनोँ की तरह साफ नहीँ है। सम्भव है कोई अनाम संस्था आयोजक हो पर संघ और भाजपा पूरी तरह शामिल है। अगर साम्प्रदायिक सद्भाव न बिगडे तो इस पर क्या आपत्ति हो सकती है, पर आयोजन मेँ विधि व्यवस्था बनाने की जिम्मेवारी वाले कल्कटर और पूरी प्रशासनिक मशीनरी का इस स्तर तक भागीदार बन जाना घोए आपत्तिजनक है।

क्या राहुल मजबूत विपक्ष खडा कर पाएंगे राहुल गांधी?

हैरानी नहीँ कि राज्य मेँ बेदम हो चुकी कांग्रेस पार्टी या दूसरी जमातोँ के पास इस बात का दमदार विरोध करने और मसले को सही मंचोँ स एउठाकर दोषी अधिकारियोँ को सजा दिलाने की कोई पहल नहीँ दिखती है। विधान सभा मेँ पिपक्ष के नेता अजय सिन्ह ने जरूर कलक्टरोँ की भागीदारी की आलोचना का कर्मकान्ड निभाया पर वे या उनकी पार्टी इसे एक मुद्दा नहीँ बना पाई है जबकि यह नाटक 19 दिसम्बर से ही चल रहा है। अजय सिन्ह ने मुख्य सचिव को पत्र लिखने की तैयारी तो बताई थी पर वह भी किया या नहीँ पता नहीँ। इसके पीछे कई वजह होंगे। एक तो कांग्रेस खुद नरम हिन्दुत्व की लाइन लेने लगी है और कम से कम हिन्दुत्व से जुडे मुद्दोँ के विरोध से तो परहेज करने ही लगी है। पर ज्यादा बडी बात यह है कि नौकरशाही के कामकाज मेँ छेडछाड और उनसे गैर प्रशासनिक काम लेने मेँ वह भी पीछे नहीँ रही है। यह सही हो सकता है कि आज भाजपा ने उसे पीछे छोद दिया हो पर अधिकारियोँ को लगभग घरेलू नौकर जैसा बनाकर रखने मेँ पिछले प्रशासकोँ ने भी कोई कोताही नहीँ की। नाम गिनवाना आसान है, पर लिस्ट इतनी बडी है कि पन्ना भर जाएगा। और इस काम मेँ मायावती, मुलायम, करुणानिधि, जयललिता, चौटाला, बादल जैसे सभी क्षेत्रीय क्षत्रप भी शामिल हैँ।


पर दोष इकतरफा नहीँ है। अधिकारी भी बिना बारी प्रोन्नति, मालदार पदोँ पर तैनाती और सत्ता के इर्द-गिर्द रहने के लिये दिन रात एक किये रहते हैँ। अगर नेता जाति, धर्म, इलाके के आधार पर पक्षपात करता है तो अधिकारी भी अपनी बिरादरी और इलाके के आधार पर अधिकारियोँ स एचिपकने का प्रयास करते हैँ। कई बार तो साहब की मेमोँ, बच्चोँ, सालोँ, रिश्तेदारोँ तक की चापलूसी करके या उनके कुत्ते का इलाज कराने तक मेँ तत्परता दिखा कर वे मनचाही पोस्टिंग चाहते हैँ। पर राजनीति और शासन का यह उल्टा हिसाब हो गया है कि जो नौकरशाह ईमानदार है और नियमोँ के हिसाब से काम करता है उसका ज्यादातर कार्यकाल शंटिंग मेँ, खराब पदोँ पर या निलम्बन मेँ बीतता है। अभी भी ऐसे कई सारे अधिकारी हैँ जिन्हे साल मेँ पांच छह तबादले झेलना होता है। और हर पार्टी की सरकार ऐसा करती है करती रही है। दूसरी ओर नेताओँ से अतिरिक्त निष्ठा सिर्फ सेवा काल मेँ ही लाभ नहीँ देती, सेवानिवृत्त्ति के बाद भी फल देती है। पर यह गिनवाने का मतलब नहीँ है कि जब किसी, और आज के सन्दर्भ मेँ मध्य प्रदेश के इस तीन कलक्टरोँ समेत दर्जनोँ अधिकारियोँ-कर्मचारियोँ का सप्रमाण गलत आचरण सामने आया है तो उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो। सख्त कार्रवाई ही दोनोँ पक्षोँ की दुरभिसन्धि को तोडेगी।

और एक जमाना था जब मुल्क के राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने काशी के पंडितोँ का पैर धोया था तो उसकी काफी आलोचना हुई। डा। राममनोहर लोहिया ने तो इसे एक बडा राजनैतिक मुद्दा ही बना दिया। उस जमाने मेँ प्रशासनिक सेवा मेँ जाने वालोँ के राजनैतिक विचार भी मुद्दा बनते थे और साम्प्रदायिक सोच या कम्युनिष्ट विचारधारा का व्यक्ति शासन मेँ न चला जाए यह खास खयाल रखा जाता है। यह किस्सा चर्चित है कि सैयद शहाबुद्दीन विदेश स एवा के लिये चुन लिये गए थे पर एसएफाअई से सम्बन्ध रखने के चलते उनकी नियुक्ति नहीँ हो पा रही थी। कहते हैँ कि तब पंडित नेहरू ने दखल देकर उनका नियुक्ति पत्र जारी किया था। पंडित जी किसी भी ऐसे आयोजन मेँ जाने से बचते थे जिसका जाति, मजहब या क्षेत्र के लिये राजनैतिक मतलब हो। तभी ये बातेँ शासन के संस्कार और प्रशासकोँ की आचार सन्हिता का हिस्सा बनीम। आज अगर कोई सरकार दल या नौकरशाह उसके खिलाफ जाता है तो उसके खिलाफ जरूर कार्रवाई होनी चाहिये।

हर ताज़ा अपडेट पाने के लिए के फ़ेसबुक पेज को लाइक करें।